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________________ श्रीआवश्यक नियुक्तिभाष्यश्रीहारि० वृत्तियुतम् भाग-३ // 1146 / / जीव०॥ य॥५॥ इय जाव पंच मासा विहरइ हु पंचमा भवे पडिमा। छट्ठीए बंभयारी ता विहरे जाव छम्मासा॥६॥ सत्तम सत्त उ . चतुर्थमासे णवि आहारे सचित्तमाहारं / जंजं हेडिल्लाणं तं तो परिमाण सव्वंपि॥७॥आरंभसयंकरणं अट्ठमिया अट्ठमास वजेइ। मध्ययनम् प्रतिक्रमणं, नवमा णव मासे पुण पेसारंभे विवज्जेइ॥८॥दसमा पुण दस मासे उद्दिट्ठकयंपि भत्त नविभुंजे ।सो होई छुरमुंडो छिहलिं वा। 4.3 षष्ठादिधारए जाहिं ॥९॥जं निहियमत्थजायं पुच्छंति नियाण नवरि सो आह / जइ जाणे तो साहे अह नवि तो बेंति नवि जाणे यावत् एकत्रि शत्स्थानानि। 10 // खुरमुंडो लोओ वा रयहरण पडिग्गहं च गेण्हित्ता। समणब्भूओ विहरे णवरिं सण्णायगा उवरिं॥ 11 // ममिकार सूत्रम् अवोच्छिन्ने वच्चड़ सण्णायपल्लि दटुंजे। तत्थविसाहुव्व जहा गिण्हइ फासुंतु आहारं // 12 // एसा एक्कारसमा इक्कारसमासियासु 21(22) पडि० छहिं Bएयासु। पण्णवणवितहअसद्दहाणभावाउ अइयारो॥१३॥ द्वादशभिर्भिक्षुप्रतिमाभिः प्रतिषिद्धकरणादिना प्रकारेण योऽतिचारः कृत इति, क्रिया प्राग्वत्, तत्रोद्मोत्पादनैषणादिशुद्ध-8 भिक्षुभिक्षाशिनो भिक्षवः- साधवस्तेषां प्रतिमाः- प्रतिज्ञा भिक्षुप्रतिमाः, ताश्चमा द्वादश प्रतिमाः। मासाई सत्तता पढमाबितिसत्त (सत्त) राइदिणा। अहराई एगराई भिक्खूपडिमाण बारसगं॥१॥ च॥ 5 // इति यावत् पश्च मासान् विहरति पञ्चमी भवेत् प्रतिमा। षष्ट्यां ब्रह्मचारी तावत् विहरेत् यावत् षण्मासाः।। 6 / / सप्तमी सप्तैव मासान् नैवाहारयेत् / सचित्तमाहारम् / यद्यदधस्तनीनां तत्तदुपरितनासु सर्वमपि / / 7 // आरम्भस्य स्वयंकरणं अष्टम्यां अष्ट मासान् वर्जयति / नवमी नव मासान् पुनः प्रेषारम्भान् विवर्जयति॥ 8 // दशमी पुनर्दश मासान् उद्दिष्टकृतमपि भक्तं नैव भुङ्क्ते / स भवति क्षुरमुण्डः शिखां वा धारयति यस्याम् // 9 // यन्निहितमर्थजातं पृच्छतां निजानां परं स ब्रवीति। यदि जानाति तदा कथयति अथ नैव ब्रवीति नैव जाने॥१०॥ क्षुरमुण्डो लोचो वा रजोहरणं पतद्गृहं च गृहीत्वा / श्रमणभूतो विहरति नवरं सज्ञातीयानामुपरि // 11 // ममीकारेऽव्युच्छिन्ने व्रजति सज्ञातीयपल्ली द्रष्टुम् / तत्रापि साधुवत् यथा गृह्णाति प्रासुकं त्वाहारम्॥ 12 // एषैकादशी एकादशमासिकी एतासु / वितथप्रज्ञापनाऽश्रद्धानभावात्त्वतिचारः॥ 13 // 0 मासाद्याः सप्तान्ताः प्रथमा द्वितीया तृतीया सप्तरात्रिन्दिवमाना। अहोरात्रिकी एकरात्रिकी भिक्षुप्रतिमानां द्वादशकम् // 1 // 8 // 1146 //
SR No.600438
Book TitleAvashyak Sutram Part 03
Original Sutra AuthorN/A
AuthorPunyakiritivijay
PublisherShripalnagar Jain Shwetambar Murtipujak Derasar Trust
Publication Year2012
Total Pages508
LanguageSanskrit
ClassificationManuscript & agam_aavashyak
File Size35 MB
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