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________________ श्रीआवश्यक नियुक्तिभाष्यश्रीहारि० वृत्तियुतम् भाग-१ // 285 // 0.3 उपोद्धातनियुक्तिः, 0.3.2 द्वितीयद्वारम् , वीरजिनादिवक्तव्यताः। गाथा१-११ जिनान्तराणि। सुगमो, नवरं प्राकृतशैल्या पूर्वापरनिपातः अनिदानकृता रामाः इति, अन्यथा अकृतनिदाना रामा इति द्रष्टव्यम्, केशवास्तु कृतनिदाना इति गाथार्थः॥ 415 // एवं तावदधिकृतद्वारगाथा जिणचक्किदसाराण मित्यादिलक्षणा प्रपञ्चतो व्याख्यातेति। साम्प्रतं यश्चक्रवर्ती वासुदेवो वा यस्मिन् जिने जिनान्तरे वाऽऽसीत् स प्रतिपाद्यत इत्यनेन सम्बन्धेन जिनान्तरागमनम्, तत्रापि तावत्प्रसङ्गत एव कालतो जिनान्तराणि निर्दिश्यन्ते उसभो वरवसभगई ततिअसमापच्छिमंमि कालंमि। उप्पण्णो पढमजिणो भरहपिआ भारहे वासे॥१॥ पण्णासा लक्खेहिं कोडीणं सागराण उसभाओ। उप्पण्णो अजिअजिणो ततिओ तीसाएँ लक्खेहिं॥२॥ जिणवसहसंभवाओ दसहि उ लक्खेहि अयरकोडीणं / अभिनंदणो उ भगवं एवइकालेण उप्पण्णो॥३॥ अभिणंदणाउ सुमती नवहि उ लक्खेहि अयरकोडीणं / उप्पण्णो सुहपुण्णो सुप्पभनामस्स वोच्छामि // 4 // णउई यसहस्सेहिं कोडीणं सागराण पुण्णाणं / सुमइजिणाउ पउमो एवतिकालेण उप्पण्णो॥५॥ पउमप्पहनामाओ नवहि सहस्सेहि अयरकोडीणं / कालेणेवइएणं सुपासनामो समुप्पण्णो॥६॥ कोडीसएहि नवहि उसुपासनामा जिणो समुप्पण्णो। चंदप्पभो पभाए पभासयंतो उ तेलोक्कं // 7 // णउईए कोडीहिंससीउ सुविहीजिणो समुप्पण्णो / सुविहिजिणाओ नवहि उ कोडीहिंसीअलो जाओ॥८॥ सीअलजिणाउ भयवं सिजंसो सागराण कोडीए। सागरसयऊणाए वरिसेहिं तहा इमेहिं तु॥९॥ छब्बीसाएँ सहस्सेहिं चेव छावट्ठि सयसहस्सेहिं / एतेहिं ऊणिआ खलु कोडी मग्गिल्लिआ होइ // 10 // चउपण्णा अयराणं सिखंसाओ जिणो उ वसुपुज्जो / वसुपुजाओ विमलो तीसहि अयरेहि उप्पण्णो॥११॥ // 285 //
SR No.600436
Book TitleAvashyak Sutram Part 01
Original Sutra AuthorN/A
AuthorPunyakiritivijay
PublisherShripalnagar Jain Shwetambar Murtipujak Derasar Trust
Publication Year2012
Total Pages498
LanguageSanskrit
ClassificationManuscript & agam_aavashyak
File Size36 MB
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