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________________ श्रीसूत्रकृताङ्ग नियुक्तिश्रीशीला वृत्तियुतम् श्रुतस्कन्धः 2 // 735 // श्रुतस्कन्धः२ षष्ठमध्ययन आईक्रीयम्, सूत्रम् 29-36 (764-771) आई कस्योत्तरः ( // 765 // ) उई अहेयं तिरियं दिसासु, विन्नाय लिंगंतसथावराणं / भूयाभिसंकाइ दुगुंछमाणे, वदे करेजा व कुओ विहऽत्थी? // सूत्रम् 31 // ( // 766 // ) __ पुरिसेत्ति विन्नत्तिन एवमत्थि, अणारिए से पुरिसे तहा हु। को संभवो? पिन्नगपिंडियाए, वायावि एसा बुझ्या असच्चा ॥सूत्रम् 32 // ( // 767 // ) वायाभियोगेण जमावहेजा, णो तारिसंवायमुदाहरिज्जा / अट्ठाणमेयं वयणं गुणाणं, णो दिक्खिए बूय सुरालमेयं / / सूत्रम् 33 // ( // 768 // ) लद्धे अढे अहो एव तुन्भे , जीवाणुभागे सुविचिंतिए व / पुव्वं समुदं अवरं च पुढे, उलोइए पाणितले ठिए वा // सूत्रम् 34 // ( // 769) जीवाणुभागंसुविचिंतयंता, आहारिया अन्नविहीय सोहिं।न वियागरे छन्नपओपजीवि, एसोऽणुधम्मो इह संजयाणं ॥सूत्रम् 35 // ( // 770 // ) सिणायगाणंतु दुवेसहस्से, जे भोयए नियए भिक्खुयाणं। असंजए लोहियपाणि से ऊ, णियच्छति गरिहमिहेव लोए॥सूत्रम् 36 // ( // 771 // ) स्नातका-बोधिसत्त्वाः, तुशब्दात्पश्चशिक्षापदिकादिपरिग्रहः, तेषां भिक्षुकाणां सहस्रद्वयं निजे शाक्यपुत्रीये धर्मे व्यवस्थितः कश्चिदुपासकः पचनपाचनाद्यपि कृत्वा भोजयेत् समांसगुडदाडिमेनेष्टेन, ते पुरुषा महासत्त्वाः श्रद्धालव: पुण्यस्कन्धं महान्तं // 735 //
SR No.600435
Book TitleSutrkritang Sutram Dwitiya Shrutskandh
Original Sutra AuthorN/A
AuthorPunyakiritivijay
PublisherShripalnagar Jain Shwetambar Murtipujak Derasar Trust
Publication Year2012
Total Pages328
LanguageSanskrit
ClassificationManuscript & agam_sutrakritang
File Size24 MB
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