________________ श्रीसूत्रकृताङ्गं नियुक्तिश्रीशीला वृत्तियुतम् श्रुतस्कन्धः 2 // 490 // श्रुतस्कन्धः 2 प्रथममध्ययनं पौण्डरीकम्, नियुक्तिः 142-157 पुण्डरीकादिनिक्षेपाः श्रुतस्कन्धस्य सम्बन्धीनि सप्त महाध्ययनानि प्रतिपाद्यन्ते, महान्ति च तान्यध्ययनानि, पूर्वश्रुतस्कन्धाध्ययनेभ्यो महत्त्वादेतेषामिति, तत्र महच्छब्दाध्ययनशब्दयोर्निक्षेपार्थं नियुक्तिकृदाह नि०- णामंठवणादविए खेत्ते काले तहेव भावे य / एसो खलु महतंमि निक्खेवो छव्विहो होति // 142 // नि०- णामंठवणादविए खेत्ते काले तहेव भावे य / एसो खलु अज्झयणे निक्खेवो छव्विहो होति // 143 // नि०- णामंठवणादविए खेत्ते काले य गणण संठाणे / भावे य अट्ठमे खलु णिक्खेवो पुंडरीयस्स // 144 / / नि०- जो जीवो भविओखलु ववजिउकामो पुंडरीएसु / सो दव्वपुंडरीओ भावंमि विजाणओ भणिओ॥१४५॥ नि०- एगभविए य बद्धाउए य अभिमुहियनामगोए य / एते तिन्निवि देसा दव्वंमि य पोंडरीयस्स // 146 // नि०- तेरिच्छिया मणुस्सा देवगणा चेव होंति जे पवरा / ते होंति पुंडरीया सेसा पुण कंडरीया उ॥१४७ // नि०- जलयर थलयर खयराजे पवरा चेव होंति कंता य / जे असभावेऽणुमया ते होंति पुंडरीया उ॥१४८ // नि०- अरिहंत चक्कवट्टी चारण विजाहरा दसारा य ।जे अन्ने इड्डिमंता ते होंति पोंडरीया उ॥१४९॥ नि०-भवणवइवाणमंतरजोतिसवेमाणियाण देवाणं / जे तेसिं पवरा खलु ते होंति पुंडरीया उ॥१५०॥ नि०- कसाणंदूसाणं मणिमोत्तियसिलपवालमादीणं ।जे अ अचित्ता पवरा ते होंति पोंडरीया उ॥१५१॥ नि०- जाईखेत्ताइंखलु सुहाणुभावाइं होंति लोगंमि / देवकुरुमादियाई ताईखेत्ताई पवराई॥१५२॥ नि०-जीवा भवट्टितीए कायठितीए य होंति जे पवरा / ते होंति पोंडरीया अवसेसा कंडरीया उ॥१५३ / / 0 ववञ्जिकामो य पुंड (मु०)। 0 अच्चित मीसगेसुं ब्वेसुं जे य होंति पवरा उ। ते होंति पोंडरीया, सेसा पुण कंडरीया उ॥१॥ इति प्रत्यन्तरेऽधिका गाथा // // 490 //