________________ श्रीसूत्रकृताङ्गं नियुक्तिश्रीशीला वृत्तियुतम् श्रुतस्कन्धः१ // 394 // द्वादशमध्ययन समवसरणम्, सूत्रम् 9-12 त्वत्र शशमस्तकसमवायि विषाणं नास्तीत्येतत्प्रतिपाद्यते, तदेवं सम्बन्धमात्रमत्र निषिध्यते नात्यन्तिको वस्त्वभाव इति, / श्रुतस्कन्धः एवमन्यत्रापि द्रष्टव्यमिति / तदेवं विद्यमानायामप्यस्तीत्यादिकायां क्रियायां निरुद्धप्रज्ञास्तीर्थिका अक्रियावादमाश्रिता इति // 8 // 542 // अनिरुद्धप्रज्ञास्तु यथावस्थितार्थवेदिनो भवन्ति, तथाहि-अवधिमनःपर्यायकेवलज्ञानिनस्त्रैलोक्योदरविवरवर्तिनः पदार्थान् करतलामलकन्यायेन पश्यन्ति, समस्तश्रुतज्ञानिनोऽपि आगमबलेनातीतानागतानर्थान् विदन्ति, येऽप्यन्येऽष्टाङ्गनिमित्तपारगास्तेऽपि निमित्तबलेन जीवादिपदार्थपरिच्छेदं विदधति, तदाह (543-546) प्रवादचतुष्कं संवच्छरं सुविणं लक्खणं च, निमित्तदेहं च उप्पाइयं च / अटुंगमेयं बहवे अहित्ता, लोगंसि जाणंति अणागताई। सूत्रम् 9 // परतीर्थिक ( // 543 // ) परिहारंच केइ निमित्ता तहिया भवंति, केसिंचि तं विप्पडिएति णाणं / ते विजभावं अणहिज्जमाणा, आहेसु विजापरिमोक्खमेव // सूत्रम् 10 // ( // 544 / / ) ते एवमक्खंति समिच्च लोग, तहा तहा (गया)समणा माहणा य। सयं कडं णन्नकडं च दुक्खं, आहेसु विज्जाचरणं पमोक्खं // सूत्रम् 11 // // 545 // ) तेचक्खुलोगसिह णायगा उ, मग्गाणुसासंति हितं पयाणं। तहा तहा सासयमाहुलोए, जंसी पया माणव! संपगाढा ॥सूत्रम् 12 // ( // 546 // ) सांवत्सर मिति ज्योतिषं स्वप्नप्रतिपादको ग्रन्थः स्वप्नस्तमधीत्य लक्षणं श्रीवत्सादिकम्, चशब्दादान्तरबाह्यभेदभिन्नम्, निमित्तं वाक्प्रशस्तशकुनादिकं देहे भवं देह-मषकतिलकादि, उत्पाते भवमौत्पातिकं- उल्कापातदिग्दाहनिर्घातभूमिकम्पा // 394 //