________________ श्रीस्थानाङ्ग श्रीअभय० वृत्तियुतम् भाग-१ // 34 // पेक्षया अष्टविधाऽपि विपाकोदयप्रदेशोदयापेक्षया वा द्विविधाऽपि आभ्युपगमिकी- शिरोलोचादिका औपक्रमिकीरोगादिजनितेत्येवं वा द्विविधाऽपि वेदनासामान्यादेकैवेति // अनुभूतरसं कर्म प्रदेशेभ्यः परिशटतीति वेदनानन्तरं कर्मपरिशटनरूपां निर्जरां निरूपयन्नाह-एगा निजरा निर्जरणं निर्जरा विशरणं परिशटनमित्यर्थः, साचाष्टविधकर्मापेक्षयाऽष्टविधाऽपि द्वादशविधतपोजन्यत्वेन च द्वादशविधाऽपि अकामक्षुत्पिपासाशीतातपदंशमशकमलसहनब्रह्मचर्यधारणाद्यनेकविधकारणजनितत्वेनानेकविधाऽपि द्रव्यतो वस्त्रादेर्भावतः कर्मणामेवं द्विविधाऽपि वा निर्जरा सामान्यादेकैवेति / ननु निर्जरामोक्षयोः कः प्रतिविशेषः?, उच्यते, देशतः कर्मक्षयो निर्जरा सर्वतस्तु मोक्ष इति // इह च जीवो विशिष्टनिर्जराभाजनं प्रत्येकशरीरावस्थायामेव भवति न साधारणशरीरावस्थायामतः प्रत्येकशरीरावस्थस्य जीवस्य स्वरूपनिरूपणायाह-‘एगे जीवे' इत्यादि, अथवा उक्ताः सामान्यतः प्रस्तुतशास्त्रव्युत्पादनीया जीवादयो नव पदार्थाः, साम्प्रतं जीवपदार्थ विशेषेण प्ररूपयन्नाह एगे जीवे पाडिक्कएणं सरीरएणं // सूत्रम् १७॥एगा जीवाणं अपरिआइत्ता विगुव्वणा // सूत्रम् १८॥एगे मणे ॥सूत्रम् 19 // एगा वई। सूत्रम् २०॥एगे कायवायामे // सूत्रम् २१॥एगा उप्पा॥सूत्रम् २२॥एगा वियती॥सूत्रम् 23 // एगा वियच्चा // सूत्रम् 24 ॥एगा गती॥ सूत्रम् 25 // एगा आगती॥ सूत्रम् 26 // एगे चयणे। सूत्रम् 27 // एगे उववाए ॥सूत्रम् 28 // एगा तक्का।सूत्रम् 29 ॥एगा सन्ना // सूत्रम् ३०॥एगा मन्ना // सूत्रम् ३१॥एगा विन्नू।सूत्रम् 32 / / एगा वेयणा // सूत्रम् 33 // एगे छेयणे। सूत्रम् 34 // एगे भेयणे॥सूत्रम् 35 / / एगे मरणे अंतिमसारीरियाणं॥ सूत्रम् 36 // एगे संसुद्धे अहाभूए पत्ते / / सूत्रम् 37 // एगदुक्खे जीवाणं एगभूए। सूत्रम् 38 // एगा अहम्मपडिमा जं से आया परिकिलेसति // सूत्रम् ३९॥एगा धम्मपडिमा जं से आया पज्जवजाए॥सूत्रम् 40 // प्रथममध्ययनमकस्थानम्, सूत्रम् 17-43 प्रत्येकशरीरम्, अपर्यादाय वैक्रियम्, मनोवाकायव्यायामः, उत्पाद:, विगतिः विवर्चा, गतिः, आगतिः, च्यवनम्, उपपात: तर्का, संज्ञा, मतिः, विज्ञः, वेदना, छेदनम्, भेदनम्, अन्त्यदुःखम्, अधर्मप्रतिमा, धर्मप्रतिमा, जीवानां मनः, उत्थानादि, ज्ञानादि // 34 //