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________________ श्रीआचाराङ्ग नियुक्तिश्रीशीला० वृत्तियुतम् श्रुतस्कन्धः२ // 659 // | ईर्या, ग्रामान्तरं गच्छेदिति // 338 // तथा श्रुतस्कन्धः 2 से भिक्खू दूइज्जमाणे अंतरा से अरायणि वा गणरायाणि वा जुवरायाणि वा दोरजाणि वा वेरजाणि वा विरुद्धरजाणि वा सइ चूलिका-१ तृतीयमध्ययनं लाढे विहाराए संथ० जण नो विहारवडियाए०, केवली बूया आयाणमेयं, तेणंबाला अयं तेणंतं चेव जाव गमणाए तओ सं० गा० दू०॥सूत्रम् 339 // प्रथमोद्देशकः कण्ठ्यम्, नवरं अराजानि यत्र राजा मृतः युवराजानि यत्र नाद्यापि राज्याभिषेको भवतीति / / 339 // किञ्च सूत्रम् 339-340 से भिक्खू वा गा० दूइज्जमाणे अंतरा से विहं सिया, से जं पुण विहं जाणिज्जा एगाहेण वा दुआहेण वा तिआहेण वा चउआहेण |विहारवा पंचाहेण वा पाउणिज वा नो पाउणिज्ज वा तहप्पगारं विहं अणेगाहगमणिनं सइ लाढे जाव गमणाए, केवली बूया आयाणमेयं, प्रतिषेधः सूत्रम् 341 अंतरा सेवासे सिया पाणेसुवा पणएसुवा बीएसुवा हरि० उद० मट्टियाए वा अविद्धत्थाए, अह भिक्खूजंतह० अणेगाह० जाव नो पव०, तओ सं० गा० दू०॥ सूत्रम् 340 / / स भिक्षुामान्तरं गच्छन् यत्पुनरेवं जानीयात् अन्तरा ग्रामान्तराले मम गच्छतः विहं ति अनेकाहगमनीयः पन्थाः स्यात् / भवेत्, तमेवंभूतमध्वानं ज्ञात्वा सत्यन्यस्मिन् विहारस्थाने न तत्र गमनाय मतिं विदध्यादिति, शेषं सुगमम् ॥३४०॥साम्प्रतं नौगमनविधिमधिकृत्याह से भि० गामा० दूइजिजा० अंतरा से नावासंतारिमे उदए सिया, सेजंपुण नावं जाणिज्जा असंजए अभिक्खुपडियाए किणिज्ज वा पामिच्चेज वा नावाए वा नावं परिणाम कट्ट थलाओ वा नावं जलंसि ओगाहिज्जा जलाओवा नावं थलंसि उक्तसिजापुण्णं वा नावं O राजाभि० (प्र०)। विहार स्वरूप: // 659
SR No.600431
Book TitleAcharang Sutram Dwitiya Shrutskandh
Original Sutra AuthorN/A
AuthorPunyakiritivijay
PublisherShripalnagar Jain Shwetambar Murtipujak Derasar Trust
Publication Year2012
Total Pages240
LanguageSanskrit
ClassificationManuscript & agam_acharang
File Size15 MB
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