________________ श्रीआचाराङ्गं नियुक्तिश्रीशीला० वृत्तियुतम् श्रुतस्कन्धः१ // 135 // श्रुतस्कन्धः प्रथममध्ययनं शस्त्रपरिज्ञा, सप्तमोद्देशक: सूत्रम् 57 वायुसमारम्भ निवृत्तिः तहिं खारं॥५॥पक्खित्तो जत्थ णरो णवरं गोदोहमेत्तकालेणं। णिज्जिण्णमंससोणिय अट्ठियसेसत्तणमुवेइ॥६॥दो ताहे पुव्वमए पुरिसे आणावए तहिं राया एगं गिहत्थवेसंबीयं पासंडिणेवत्थं ॥७॥पुव्वं चिय सिक्खविए ते पुरिसे पुच्छए तहिं राया। को अवराहो एसिं? भणंति आणं अइक्कमइ॥ 8 // पासंडिओ जहुत्ते ण वट्टइ अत्तणो य आयारे। पक्खिवह खारमज्झे खित्ता गोदोहमेत्तस्स ॥९॥दट्ठणऽट्ठिवसेसे ते पुरिसे अलियरोसरत्तच्छो। सेहं आलोयंतो राया तो भणइ आयरियं // 10 // तुम्हवि कोऽवि पमादी? सासेमि य तंपिणत्थि भणइ गुरू / जइ होही तो साहे तुम्हे च्चिय तस्स जाणिहिह // 11 // सेहो गए णिवंमी भणई ते साहुणो उण पुणत्ति / होहं पमायसीलो तुम्हं सरणागओ धणियं // 12 // जइ पुण होज्ज पमाओ पुणो ममं सडभावरहियस्स / तुम्ह गुणेहिं सुविहिय! तो सावगरक्खसा मुच्चे // 13 // आयंकभओविग्गो ताहे सो णिच्चउज्जुओ जाओ। कोवियमती य समए रण्णा मरिसाविओ पच्छा॥१४॥ दव्वायंकादंसी अत्ताणं सव्वहा णियत्तेइ / अहियारंभाउ सया जह सीसो धम्मघोसस्स ॥१५॥भावातङ्कादर्शी तु नरकतिर्यमनुष्यामरभवेषु प्रियविप्रयोगादिशारीरमानसातङ्कभीत्या संयुक्तपूर्वं तत्र क्षारम्॥५॥ प्रक्षिप्तो यत्र नरो नवरं गोदोहमात्रकालेन / निर्जीर्णमांसशोणितोऽस्थिशेषत्वमुपैति // 6 // द्वौ तदा पूर्वमृतौ पुरुषावानयति तत्र राजा। एक गृहस्थवेषं द्वितीय पाषण्डिनेपथ्यम् // 7 // पूर्वमेव शिक्षितान् तान् पुरुषान् पृच्छति तत्र राजा / कोऽपराधोऽनयोः? भणन्ति आज्ञामतिक्रामति॥ 8 // पाखण्डिको यथोक्ते न वर्तते आत्मनश्चाचारे। प्रक्षिपत क्षारमध्ये क्षिप्तौ गोदोहमात्रेण // 9 // दृष्ट्वाऽस्थ्यवशेषौ तौ पुरुषौ अलिकरोषरक्ताक्षः। शैक्षकमालोकयन् राजा ततो भणत्याचार्यम् // 10 // युष्माकमपि कोऽपि प्रमादी?, शासयामि च तमपि नास्ति भणति गुरुः / यदि भविष्यति तदा कथयिष्यामि यूयमेव तं ज्ञास्यथ / / 11 // शैक्षको गते नृपे भणति तान् साधूंस्तु न पुनरिति / भविष्यामि प्रमादशीलो युष्माकंशरणागतोऽत्यर्थम् // 12 // यदि पुनर्भवेत्प्रमादः पुनर्मम शठ (श्राद्ध) भावरहितस्य / युष्माकं गुणैः / सुविहिताः ततः श्रावकराक्षसात् मुचेयम् // 13 // आतडूभयोद्विग्रस्तदास नित्यमुद्युक्तो जातः / कोविदमतिश्च समये राज्ञा क्षमितः पश्चात् / / 14 / / द्रव्यातङ्गादर्शी आत्मानं सर्वथा निवर्त्तयति / अहितारम्भात् सदा यथा शिष्यो धर्मघोषस्य // 15 // * पवट्टइ (प्र०)1* अवलोयंतो (प्र०)। // 135 //