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________________ भविष्यदत्तचरित्रम् चतुर्थोऽधिकारः पापेन मतिहीनेनाऽकार्यमेतद्विनिर्मितम् / दत्तः कुले कलङ्कोऽयमनेन छलशालिना // 8 // यदि वा किं विकल्पेन, विषादेनाऽप्यलं हृदि / विधेविलसितादेवं, भावि तत्को निवारयेत् // 9 // यतः-जं चिय विहिणा लिहिय, तं चिय परिणमयइ सयललोयम्मि / इय जाणेविणु धीरा, विहूरे विण कायरा हुंति // 10 // धैर्यमालम्ब्य तत्कालं, मुक्त्वाऽऽशां स्वजनादिषु / भाग्यभावनयोत्तालश्चचाल वनसन्मुखः॥११॥ पविष्टः सिंहवत्तस्मिन् , कानने भीषणानने / मिश्रे तमिस्तवृक्षाणां, शाखाभिः स्थगिताम्बरे // 12 // अहो रात्रं यत्र रात्रेसति झिल्लिकारणैः / घूक्कृतं घूकवर्गस्य, शाश्वतं शाश्वतस्थिते // 13 // क्वचिद्वन्यगजेन्द्राणां, पिच्छलं मदवारिणा / दवारिणात्क्वचिदग्धं, दर्भसन्दर्भितं क्वचित् // 14 // क्वचिदगिरिगणागम्यं, रम्यं क्वापि लतागृहैः / क्वचित्सुरभिपुष्पोधैर्दारुणं सर्पसर्पणैः // 15 // नृत्यन्मयूरविस्तीर्णकलापछत्रमावहत् / वनं सूचयतीव स्वां, दुर्गवर्गेषु राजताम् // 16 // भ्रान्त्वा चिरं परिश्रान्तो, वने मृगेन्द्रसेवने / मण्डपे सोऽतिमुक्तद्रुसंकुलेऽथ निविष्टवान् // 17 // अपनीय श्रमं देहात्पाचे क्वाऽपि जलाशये / स्नात्वा पुष्पाञ्जलिः, पूजां स्मृताह तं स निर्ममे // 18 // आहृत्य ज्ञातवृक्षाणां, फलानि सुहितस्ततः / क्षणमात्रं विशश्राम, रमणीये रसातले // 19 // विश्राम्यन्तमिवाऽऽलोक्य, तं धमनब्जबान्धवः / किं तदैवाऽस्तशैलेन्द्रशिलासु निषसाद सः // 20 // सूरसङ्गमनादेव, प्रतीची रागवत्यभूद / जाता तत्मतिबिम्बेन, बिम्बेऽर्कस्यापि शोणता // 21 // 22
SR No.600427
Book TitleBhavishyadutta Charitram
Original Sutra AuthorN/A
AuthorMeghvijay Gani, Mafatlal Zaverchand Gandhi
PublisherMafatlal Zaverchand Gandhi
Publication Year1936
Total Pages170
LanguageSanskrit
ClassificationManuscript
File Size12 MB
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