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________________ भविष्यदत्त चरित्रम् द्वितीयोऽ विकार EXERCISCEBOX तत्मसीद स्नेहशा, विलोक्याऽऽलापय स्वयम् / इत्युक्त्वा करसंस्पर्श पत्युर्यावच्चिकीर्षति // 40 // तावत्कोपाऽनलज्वाला-करालः स जगाविति / इतोऽपसर दूरे रे! याहि याहि पितुर्ग्रहम् // 41 // किं क्लेशेनाऽमुना साध्यमाराध्यमपरं भज / त्यज मद्गेहसंवासं, ब्रजस्व स्वैरविभ्रमे // 42 // ततः सगद्गदं वाला, बभाषे स्फुरतिाऽधरा / किं केन वञ्चितो बूषे, कुलिनाऽनुचितं वचः // 43 // त्वत्कुलं मत्कुलं वाऽपि, न मयाऽस्ति कलङ्कितम् / त्वते शरणं नाऽन्यस्तत्वा याम्यधुना प्रिय ! // 44 // प्रत्याय निजे गेहे, स्नेहे दत्ता जलाञ्जलिः / सबाष्पतरलाक्षी सा, स्वात्मनीत्यन्वभावयत् // 45 // इयस्कालं चिरं जीव ! पत्या मानेन वदितः / ततो विषयवान्छायाः, स्वयं किं न निवर्त्तसे // 46 // वीतरागैरयं रागस्त्यक्तो दुर्गतिसाधनम् / तं निरुद्धय विबुद्धयस्व. जिने तागृप्यभावनात् // 47 // इत्याशास्य स्वमात्मानं, मनाग वैराग्यमीयुषी / हास्यं लास्यं न वा मानमपमानरुचिं दधौ // 48 // नाऽखकार न नेपथ्यं, न माल्यं न प्रसाधनम् / कटासर्नेक्षण चक्रे, जल्पनं न विकल्पनम् / / 49 // त्रिकाल जिनपूजायां, ज्यायांसं भावमाश्रिता / पत्युदुर्वचनैर्नुन्ना, गृहं प्राप्ता हरेः पितुः // 50 // श्रेष्ठिना तद्गति हावा, मुक्तः कोऽपि जनोऽनुगः। तस्याः पित्रोः पुरोऽवाचि, वाचिकं तेन सत्वरम् // 51 // इयं हि भवतोः पुत्री, कुलमार्गोंचितक्रिया-गुणैः पियाऽपिया वापि, स्वगृहे रक्षतादिति // 52 // हरिदत्तेन तं श्रुत्वा, तां समाचास्य सदगिरा / विलक्षेन स्थितं गेहे, यद्भावि तद् ध्रुवं भवेत् // 53 //
SR No.600427
Book TitleBhavishyadutta Charitram
Original Sutra AuthorN/A
AuthorMeghvijay Gani, Mafatlal Zaverchand Gandhi
PublisherMafatlal Zaverchand Gandhi
Publication Year1936
Total Pages170
LanguageSanskrit
ClassificationManuscript
File Size12 MB
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