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________________ भविष्यदत्त चरित्रम् त्रयोदशमोऽ धिकारः 102 LSXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXX कुलकीर्तिविनाशेन, मलिनीकरणं वचः। शासनस्य त्वयोदिष्टं, गर्वमुदहता भृशम् // 68 // विद्या विभूतिविनयः, शौर्य चातुर्यचेष्टितम / नाऽपेक्षन्ते कुलं क्वापि, लभ्यान्येतानि भाग्यतः॥ 69 // यतः--न श्रीः कुलक्रमायाता, शासने लिखिता नवा / खड्नेनाऽक्रम्य भुञ्जीत, वीरभोज्या वसुन्धरा // 70 // नाऽभिषेको न संस्कारः, सिंहस्य क्रियते मृगैः। विक्रमार्जितसत्त्वस्य, स्वयमेव मृगेन्द्रता // 71 // धृतः स्कन्धो मया इन्त, वणिजाऽपि महीपतेः / सेनान्यं मां पुरो धत्स्व, नाऽन्य क्षत्रियपुङ्गव ! // 72 // निःसार्योऽनार्यधीरेष, चरवत्पतिपन्थिनाम् / विभ्यत्सभ्यनृगां दत्ते, भङ्गबुद्धिं शुचाकुलः // 73 // विचार्य धैर्यमेतस्य, विहस्य पृथिवीश्वरः / व्यालुलोके स सामन्तान्, वदतः साधु साध्विति // 74 // देव नाऽयं त्वया मान्यः, सामान्य कोऽपि धीधनः। भविष्यस्सर्वशूराणां, मूख्यस्तेजोविधेनिधिः // 75 // मूतॊ वीररसः सोऽयं, महास्कन्धो भूजाबली / सेनाध्यक्षत्वमेतस्मिन् , समारोपय भूपते ! // 76 // सामन्तवचसा तेन, न्यस्ताऽस्मिन् रणभारः / न्यवेशि सेनाध्यक्षत्वे, सन्मान्याभरणांशुकैः // 77 // तमभ्यधादनन्तोऽपि, कोपाऽरुगितलोचनः / उत्कटोऽसि भटो राज्ञो, मानितः श्रेष्ठिनन्दनः // 78 // तद्वाक्ये सुदृढोभूय, नाऽहं स्थास्याम्यहं पुनः / उद्धरिष्ये वचःशल्यं, त्वां निहत्य रणाङ्गणे // 79 // इत्युक्त्वा गर्वसर्वस्व-पर्वतः सर्वतः पुरः / पुरः पश्यन्महाकोपादनन्तो निर्ययौ पुरात् // 8 // चतुराचमृयुक्तं चित्राङ्ग, वनसंस्थितम् / सङ्गत्याऽऽख्यत स्थितः किं भो, सन्धिस्तत्स्वामिना नहि // 81 // 102
SR No.600427
Book TitleBhavishyadutta Charitram
Original Sutra AuthorN/A
AuthorMeghvijay Gani, Mafatlal Zaverchand Gandhi
PublisherMafatlal Zaverchand Gandhi
Publication Year1936
Total Pages170
LanguageSanskrit
ClassificationManuscript
File Size12 MB
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