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________________ अष्टमे स्कन्धे श्री पुष्करं प्रति | दूतस्य गमनम् // सर्गः२ // 172 // विहाय कारणं सर्व तस्मिन् विमलया धिया / अकार्पण्येन सर्वाङ्गसमर्पणपरो भव तत्प्रसादेन ते किञ्चिद् न हि न्यून भविष्यति / तवैव तस्य साम्राज्यं युवयोः का विभिन्नता // 10 // पुष्करोऽप्यवदद् विद्वन्निदं साधु त्वयेरितम् / किमन्यत् पूजनीयेन शत्रुकालानलो नलः // 11 // यत् सत्यं स मम ज्येष्ठः कुलस्य च विभूषणम् / धन्यता महती तस्मिन् मम भक्ति वितन्वतः // 12 // कस्तेन सह वीरेण विरोधं कर्तुमिच्छति ? / यस्य सैन्यरजःपञ्ज निमञ्जन्ति महीभुजः // 13 // किन्तु वक्तव्यमस्त्येकं तदाकर्णय मन्मुखात् / नलभृत्य इति त्वं मे विश्वासस्यापि भाजनम् // 14 // •न राज्यं पितृदत्तं मे न च दीर्घार्जितं मया / प्राप्तं द्यूतप्रसादेन दैवस्यैव प्रभावतः // 15 // तत् कथं स स्वयं राजा राज्यं मे हर्तुमर्हति / क इव द्यूतकाराणां रणेन सह वैभवः // 16 // द्यूतेन स जितं राज्य पुनर्गृह्णातु मत्करात् / यथा दत्तं तथा ग्राह्यं नीतिरेषा महात्मनाम् // 17 // शक्त्या भक्तिपरं राजा भ्रातरं न्यायवादिनम् / यदि वाञ्छति जेतुं मां किं न लब्धं तदा मया // 18 // मम वाक्यानुसारेण गत्वा त्वं ब्रूहि सत्वरम् / स्वयमेव ततो राजा यथौचित्यं करोतु सः. // 19 // इत्युक्त्वा बहुसन्मानदानशृङ्गारपूर्वकम् / विससर्ज गुणस्यूतं नलदतं महामतिः // 20 // तन्मुखेन नृपः श्रुत्वा पुष्करस्य मनीषितम् / चकार चतुरो मन्त्रं सह तैस्तैर्विशेषिभिः // 21 // तत्र भीमकुमारास्ते विद्याधरनृपाश्च ते / पुष्करं हन्तुमिच्छन्तो युद्धमेवानुमेनिरे : HTAIIATIIII AISHA - // 22 // // 17 //
SR No.600422
Book TitleNalayanam
Original Sutra AuthorN/A
AuthorManikyadevsuri
PublisherZZZ Unknown
Publication Year
Total Pages398
LanguageSanskrit
ClassificationManuscript
File Size24 MB
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