________________ सिरिसिरि वालकदा ROCKSCENSKO जण मए पावाए पमायलग्गाइ मंद भग्गाए। संकरकयाइ पुयाइ दसणं खणमवि न लद्धं // 506 // ही ही अहं अहन्ना अन्नाणवसेण कम्मदोसणं / आसायणंपि काहं किंपि धुवं वंचिया तेण // 507 // एवं ममावराह खमसु तुमं नाह ! कुणसु सुपसायं / मह पुन्नविहीणाए दीणाए दंसणं देसु // 508 // सङ्करेण-शुभाशुभरूपमिश्रभावेन कृतया पूजया दर्शनं-प्रभोनिरीक्षणं क्षणमपि न लब्धं-न प्राप्तम् // 506 // ही हीति खेदेऽहं अधन्यास्मि अज्ञानवशेन कर्मदोषेण कामपि आशातनां-विराधनामपि अकार्ष-कृतवती अस्मि तेन कारणेन ध्रुवं-निश्चितं वञ्चिताऽस्मि // 507 // हे नाथ ! एवं ममापराध क्षमस्व, त्वं सुष्ठु-शोभनं का प्रसादम्-अनुग्रहं कुरुष्व, पुण्यविहीनायै दीनायै मह्यं दर्शनं दत्स्व / / 508 // ५०६-स्पष्टम् / ५०७-भत्र 'ना' शब्दस्यासकृदावृत्या छेकानुपासः / ५०८-अनुप्रासः।