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________________ मणिपति चरित्रम्. तासामाधाः कृत्वा बने वेश्या विसावश्याजनो बहिर्या निर्यात महा। हारकथ कम. अत्रान्तरे क्वचित्पर्व-ण्युद्यानक्रीडया मुदा। वश्याजनो बहिपुर्या निर्यातः सर्वसंपदा // 653 // क्रीडा नानाविधाः कृत्वा वने वेश्या विटैः समं / तत्रैत्यामजन् सरस्या-महं स्थानेऽस्मि यत्र च / / 654 // तासां मध्येऽतिरूपाढ्यां स्नान्तीं दृष्ट्वा सरोजले / मगधोपपदां सेनां वेश्यां सर्वाङ्गनाऽतिगाम् // 655 // विद्याधरयुवा कश्चित् तद्रूपाऽऽक्षिप्तचेतसा / अपाहरहिवा वेगात् प्रत्यक्षं सर्वकामिनाम् // 656 // पूत्कृतं सर्व लोकंन पार्श्वस्थेन महारवैः / हा हा ! ! केनापि देवेन नीयते त्रायतामियम् / / 657 // तन्मयाऽऽकर्ण्य कर्णान्तं बाणमाकृष्य सत्वरं / विडो विद्याधरः पाणी विद्या हि फलति युनः // 658 // ततस्तद्धस्ततः पीडा-विधुरात् साऽपतत् क्षणात् / सरोमध्ये तथा नाऽभूत् मनागपि यथा व्यथा // 659 // उत्तीर्य सरसो हृष्टा ममान्तिकमुपागता / युक्तहस्ताऽवदचार्य-पुत्राऽहं रक्षिता यमात् // 660 // तदिदानों महाभाग ! मय्यनुग्रहकाम्यया / कदलीगृहमिदं यावत् प्रसीदाऽऽगम्यतामिति // 661 // सतोऽहं तदनुवृत्या प्रयातः कदलीगृहं / अनेकचेटिकासार्थ-युक्तं च सुखसंपदा // 662 // तत्रासने निषण्णस्य ममाऽभ्यङ्गादिकां क्रियां / विधाय षडरसोपेतं भोजनं दौकितं पुरः // 663 // ततश्च विधिना भुक्तं भूयः शय्याव्यवस्थितं / चटीभिः मृद्यमानं मां साऽवोचन मगधाऽभिधा / / 664 // आर्यपुत्र ! कुतो यय-मिह प्राप्तो ? मयोदितम् / उञ्जयिन्यास्तयाऽभाणि किं प्रतीत्य प्रयोजनम् // 66 // - वार
SR No.600401
Book TitleManipati Rajarshi Charitam
Original Sutra AuthorN/A
AuthorJambukavi, Bhagwandas Pt
PublisherHemchandra Granthmala
Publication Year1922
Total Pages164
LanguageSanskrit
ClassificationManuscript
File Size11 MB
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