________________ श्रीअमम // 46 // वन्मुनिः। हन्यतां तज्जवात्सर्वमतो दहति येन न // 35 // असौहार्द नवं किञ्चित् कर्मणामात्मवत्तिनाम् / तमेवाऽसुहृदं कृत्वा कुर्वतेऽन्य-| जिनेश| ममूनि यत् // 36 // हत्वा मुट्यादिभिस्त तेऽधः प्रपात्य त्रिदण्डिनम् / मृतप्राय विधायाशु विविशुः स्वस्ववेश्मसु // 37 // चरैविज्ञाय चरित्रम् / | तद्विष्णुपिण्णः सीरिणा सह / तत्रैत्य तं मुनि कोपाटोपारुणितमैक्षत // 38 // महासर्पमिवोत्सर्पदपं तं फूत्कृतमुहुः / भयंकरं मांत्रि उपाये कवनेतुं शान्ति मृदूचिवान् // 39 // अज्ञानान्धैः सुतैम त्वं पीडितोऽपीक्षुदण्डवत् / धर्तुमर्हसि न क्षारभावमन्तर्मुने मनाक् // 40 // - कृतेऽपि नो शान्तो मथ्यमानेनापि दध्ना बुध्नादपि निदर्यते / स्नेह एवेह मन्थाने व्यथके मन्थकेऽपि च // 41 // तत्क्षमस्वापराधं मत्पुत्राणां त्वं महा द्वीपायनः | मुने ! क्षमाहःसत्यासत्याऽऽगस्कारिणि क्रोधवर्जनात् // 42 // इत्थं कृष्णेन चदुभिर्मुहुर्घनरसैरसौ / शम्यमानोऽपि नाऽशाम्यत्प्रत्यु प्रभुणोक्तं | तोर्व इवाज्वलन् // 43 / ऊचे च कृष्ण मा वादीर्यनिदानमहं व्यधाम् / ताडथमानो भवत्पुत्रैः पुरीं दग्धुं युवां विना // 44 // बलो विष्णोर्वालुऽभाणीन्मुधा बन्धो! मात्राऽऽयासीविधाप्यहो / सर्वालक्षणपूर्णोऽयं युगान्तेऽपि न शाम्यति / / 45 / / मन्ये साहसिको त्वं यत्सर्व कागमनं ज्ञवचोऽन्यथा / कर्तुमेवं प्रयतसे नाशः स्याद् भाविनः क्व नु? // 46 // ततः कृष्णमुखः कृष्णः सरामोऽपि ययौ गृहे / पुर्यां द्वैपा जिनत्व भवनं च यिनोक्तिश्च प्रासरत्तैलबजले // 47 // परेद्यवि द्वारकायामित्ययोपयदऽच्युतः। द्वीपायनभयं हन्तुं स्थेयं धर्मरतैर्जनैः // 48 // तदानीं | समवासापीदुञ्जयन्ते पुनः प्रभुः / तत्रैत्य नत्वा तं विष्णुरश्रौपीदिति देशनाम् // 49 / / संसारे सर्वमेवेह कुशाग्रजलवच्चलम् / ज्ञात्वा जनैनित्यसौख्यार्जने नोद्यम्यते किमु ? // 50 // प्रद्युम्नशाम्बौ निपध उल्मुकः सारणादयः / कुमारा रुक्मिणीभामाद्याथाष्टौ कृष्णवल्लभाः |सर्ग-१४ // 46 // | // 51 / / बढयो यदुखियोऽन्याश्च तया देशनया प्रभोः / जातसंसारखैराग्याः प्रौढभाग्याः प्रवत्रजुः // 52 // युग्मम् // पृष्टश्च भूयः कृष्णेनाचख्याविति जिनेश्वरः / इतोऽब्दे द्वादशे द्वैपायनो धक्ष्यति ते पुरीम् // 53 // समुद्रविजयादीन् प्राग् दीक्षितान् संस्तुवंस्ततः।