________________ श्रीअमम-1 जीवयशाः कुलद्वयविनाशकृत् / दशाहर्नादृताऽपि कंसस्याऽभूच्च मृत्यवे // 83 // इदानीं तु तवाऽहेतुप्रयाणारम्भकारिणी / पुत्री भ- जिनेश वित्री राज्यश्रीप्राणवंशान्तकृद् ध्रुवम् / / 84 // मन्यसे नापशकुनं न देवज्ञं न मत्रिणः। यत्तन्नूनमियं कृत्या पुत्रीव्याजात्तवाऽलगत् चरित्रम् / // 392 // | // 85 // न च तेऽपि स्वकः कोऽपि मंत्री वा त्वां कदाग्रहात् / योऽसानिवर्तयेद् वैरं जामात्राथै करोति कः // 86 // त्वयि रुष्टं ध्रुवं जरासन्ध देवं यत्वं सुतवधच्छलात् / निषिद्धोऽपि तेन पुनः कृष्णयुद्धार्थमागमः // 87 // सहायसम्पदापि खं न्यूनो यद्रुक्मिणीहृतौ / बलयुद्धे || चक्रव्यूह बलं दृष्टं दमघोपजरुक्मिणोः // 88 / / दुर्योधनशकुन्योश्च सर्पवच्छिद्रवीक्षिणोः / वीरापसदयोः को नु विश्वासः? सोदरदुहोः // 89 // स्वरूपम् | प्रतिपन्ने दृढोप्येकः कः कण्णोऽङ्गाधिपोऽपि सः / यतः कृष्णकुमारास्तं त्रोटयिष्यन्ति खण्डशः // 90 // देशकालौ च ते नूनं विरुद्धौ | यत्स्वदेशतः / प्राप्तः सुराष्ट्रां गीष्मेऽपि ख कृष्णविजयप्रदाम् // 11 // विनिपातप्रतिकारो दृश्यते न च ते प्रभो!। उपायाभावतः कार्य सिद्धेः सन्देह एव तत् // 92 // विमृश्येति निवर्त्तस्व लजसेऽथ त्यजन् भुवम् / युध्यथा मा स्म निर्विण्णः स्वयं कृष्णो वलिष्यते // 13 // * इस्थं ते कुर्वतः स्वामिन् ! कुशलं नान्यथा पुनः / मद्वाचं मन्यसै चेन्न सा दुर्दैवस्य वश्यता // 94 // श्रुत्वेति मगधाधीशः क्रुद्धो हंस-de कमूचिवान् / यदैवं स्तौपि रे शत्रूस्तत्त्वं तैर्भेदितो ध्रुवम् // 95 // त्रस्येद् ? वाग्डम्बरैः किं ? रे मृगेशः कीशवद्रणे / धिक् त्वां कुमंत्रदं | पश्य कृष्णं कृष्णपथे क्षिपे // 96 // डिम्भकोऽथ तद्भावज्ञो मंत्री प्रोचेऽधुना प्रभोः / प्रवृत्तिः कीर्तिकृद् युद्धे निवृत्तिस्वपकीर्तिकृत सग-१० # // 97 / त्रिखण्डभरतक्षेत्रराजन्यविजयाजिता / कीतिरेकपदे देव ! हार्यते हंसमंत्रतः॥९८।। राज्ञां जयाजयौ देवाधीनौ युधि यशस्तु न / आचन्द्रार्क स्थिर भावि युद्धे तदुभयोरपि // 99 / / परैरभेद्यं तच्चक्रव्यूह त्वच्चक्ररत्नवत् / निर्माप्य त्वद्वले देव ! हनिष्यामो // 392 // द्विपद्बलम् // 100 / जरासन्धो प्रहृष्टोऽथ डिम्भकं हंसमंत्रिणा / सार्द्ध सेनाधिपैश्चाशु चक्रव्यूहमचीकरत् // 11 // राज्ञां सहस्रं चक्रे