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| जेमणे संमतितर्क जेवा महान् प्रन्य उपर तस्वबोध विधायिनी टीका बनावी के के जेर्नु प्रतिबिंव जैनदर्शनां परंपरा समय न्यायग्रन्थोमां पडयु के, ने जेना संतानीय धनेश्वरसूरि तथा प्रवचनसारोखारनी वृत्तिकार विगेरे महर्षियो.
बीजा अमयदेवसूरि नागगच्छीय रामसूरि-चंद्रसूरि-देवसूरि-अभयदेवसूरि ए रीते संबंध धरावे छे. तेमनो समय बारमी शताब्दि आसपासनो गणाय के.
त्रीजा अभयदेवसूरि रुद्रपल्लीय गच्छना स्थापक छे. चोथा अभयदेवसूरि प्रसिद्धमलधारी हेमचंद्रसूरिना गुरु के.
उपरना चार सूरिएंगवो नवांगवृत्तिकार अभयदेवरिथी मित्र छे ते वस्तु आपणने तेमणे जणावेल प्रशस्तिमा सूचवेल गुरुना मने गच्छना नामथी समजाय छे.
आचार्य जिनेश्वरसरि के जे बद्धिसागर नामे प्रसिद्ध छे तेमना शिष्य अभयदेवसूरि महाराज आ प्रश्नव्याकरण सूत्रना रचयिता छ, अने तेमनी रचेल वृत्तिना संशोधक द्रोणसूरिजी छे, ते वात तेमनी प्रशस्तिथी स्पष्ट जणाय छे.
उक्तस्त्रना वत्तिकार अभयदेवसरिजी महाराज सं. १०८८ मां सोल वर्षनी उम्मरे आचार्यपदारूढ थया के तेमणे प्रथम शातासूत्रनी वृति सं. ११२० मां रची अने त्यारपछीथी बीजा अंगोनी वृत्ति ११३३ लगभग पूर्ण करी छे. नवांगवृत्ति उपरांत षट्स्थानक भाष्य, हरिभद्रसूरिकृत पंचाशक पर वृत्ति तथा आराधनाकुलक पंचनिन्थी प्रकरण विगेरे अनेक ग्रन्थो रच्या छे. तेओना स्वर्गवास कपडवंजमां सं. ११३५ मां थयो छे.
श्री प्रश्नव्याकरणसूत्र उपर बीजी वृत्ति शास्त्रविशारद सूरिपुंगव श्रीमद् भानविमलसूरिश्वरजी महाराजनी के तेमनो परिचय नीचे मुजब के.. श्रीमाळीमोनी उत्पत्ति अने अनेककिंवदंतिमोथी जोडायेल मारवाडमा आवेल भिन्नभाल नगरमां विशाओशवालना वंशविभूषण श्रेष्ठी वासवजीपिता अने कनकावती मातानी कुक्षिप सं. १६९४ मा मंगळप्रभाते पुत्रनो जन्म थयो. संसारी अवस्थामां