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________________ अनगार तत्र पद्मासनं पादौ जकूधाभ्यां श्रयतो यतेः। तयोरुपर्यधोभागे पर्यङ्कासनमिष्यते । - ऊर्वोरुपरि कुर्वाणः पादन्यासं विधानतः । वीरासनं यतिधत्ते दुष्करं दीनदेहिनः ।। __अर्थात् वन्दना करनेवालेको पद्मासन पर्यापन और वीगसन इन तीन प्रकारके आसनोंमेंसे कोई भी करना चाहिये। दोनों पैरोंके दोनों जंघाओंसे मिलजानेपर पद्मासन, दोनों जंघाओंको ऊपर नीचे रखनेसे पर्यङ्कासन, और दोनों पैरोंको दोनों जंघाओंके ऊपर रखने से वीरासन कहते हैं। यह वीरासन दुर्बल शरीर या हीन संहनन वालोंके लिये दुर्धर है । इसको उत्कृष्ट शक्तिवाले संयमी पुरुष ही धारण कर सकते हैं। इसके सिवाय कोई कोई इन तीनों आसनोंका स्वरूप इस प्रकार बताते हैं: जघाया जङ्घया श्लिष्टे मध्यभागे प्रकीर्तितम् । पद्मासनं सुखाधायि सुसाधं सकलैर्जनः ।। बुधैरुपयधोभागे जङ्घयोरुभयोरपि । समस्तयोः कृते ज्ञेय पर्यापनमासनम् ॥ उर्वारुपरि निक्षेपे पादयोर्विहिते सति । वीरासनं चिरं कतुं शक्यं धीरैनं कातरैः ॥ जंघाका दूसरी जंघाके मध्य भागसे मिल जानेपर पद्मासन हुआ करता है. इस आसनमें बहुत सुख होता है, और समस्त लोक इसको बडी सुगमतासे कर सकते हैं। दोनों जंघाओंको आपसमें मिलाकर ऊपरनीचे रखनेसे पर्यङ्कासन कहते हैं। दोनों पैरोंको दोनों जंघाओंके ऊपर रखनेसे पीरासन कहते हैं । इस आसनको जो कातर पुरुष है वे अधिक देरतक नहीं कर सकते धीर वीर ही कर सकते हैं। किसी किसीने इन आसनोंका स्वरूप इस प्रकार बताया है कि: जधाया मध्यभागे तु संश्लषो यत्र जङ्घया। पद्मासनमिति प्रोकं वदासनविचक्षणः ॥ अन्याय
SR No.600388
Book TitleAnagar Dharmamrut
Original Sutra AuthorN/A
AuthorAshadhar Pt Khoobchand Pt
PublisherNatharang Gandhi
Publication Year
Total Pages950
LanguageSanskrit
ClassificationManuscript
File Size29 MB
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