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अनमार
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अध्याय
१
पचघाचरन्त्याचारं शिष्यानाचारयन्ति च ।
सर्वशास्त्रविदो धीरास्तेत्राचायाः प्रकीर्तिताः ॥ इति ।
जो धीर और सब शास्त्रोंके ज्ञाता होकर स्वयं पांच प्रकार के आचारका पालन करते और शिष्योंसे कराते हैं उनको आचार्य कहते हैं ।
जो इस प्रकारके निर्बंध आचायोंमें श्रेष्ठ और आगे जिनका वर्णन किया गया है उन दश विशेष गुणोंसे विशिष्ट तथा परोपकार करनेमें ही निरंतर रत रहनेवाला है उसीको व्यवहार निश्चयस्वरूप और प्रशस्त मोक्षमार्गका प्रतिपादन करना चाहिये । प्रशस्त इसलिये कहा गया है कि वह सत्पुरुषोंकीलेय सदा सेव्य है और किसी भी प्रमाणसे उसमें बाधा नहीं आ सकती है।
अब उन दश विशेष गुणों को बताते हैं जिनका कि धर्मके प्रतिपादक आचार्यमें होना आवश्यक है:
१ - वीर रससे आविष्ट व्रताचरण - गुप्ति और समिति के साथ साथ उन व्रतोंके, जिनका कि आगे चलकर वर्णन करेंगे, पालन करनेको व्रताचरण कहते हैं। इस व्रताचरणमें भी एक प्रकारका रस या हर्ष आनंद है। जिसकी कि पुष्टि निर्वेद -- संसार शरीर और भोगों के विषयमें उत्पन्न हुए वैराग्य परिणामोंसे होती है । जिसका निर्वेद शान्तरसकी प्राप्तिकी तरफ अभिमुख होकर आत्मा और शरीर के भेदज्ञानकी भावनाके बलसे बढता हुआ चला जाता है उसका व्रताचरण भी प्रकर्षताको प्राप्त करता चला जाता है। अत एव सबसे पहली बात यह होनी चाहिये कि वह धर्मके विषय में वीर रससे आविष्ट हो उसके व्रताचरणका रस बढ़ते हुए निर्वेदसे प्रतिक्षण प्रकर्षताको प्राप्त करता हुआ चला जाय ।
१ योगनिरोध को गुप्ति कहते हैं । अत एव इसके तीन भेद हैं-१ मनोगुप्ति २ वचनगुप्ति ३ कायगुप्ति | २ समीचीन प्रवृत्तिको समिति कहते हैं । इसके पांच भेद हैं- १ ईर्ष्या २ भाषा ३ एषणा ४ आदाननिक्षेपण ५ आलोकित पानभोजन |
MAHAK
SRASSMATE
धर्म०