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अमेविधिक
हो, नराण गिहिवासपायवस्सेह । महिलाजणपरिबंधो, मूलं परमत्यओ होइ ॥ १९० ॥ ताण पुण इत्थियाण, परिणामो एस जं ॥८॥
15मकरणम् अकज्जे वि । सम्भावपरंमि वि माणुसंमि, एवं पयर्टेति ॥ १९१ ॥ अहवा जं दहई सिही, मारेइ विसं भुयंगमो डसइ । तं ताण सरुवं चिय, अकज्जवित्तीण नारीण ॥१९२॥ इत्तुच्चिय धीरेहिं, इमाउ चत्ताउ चरणरेणु व्व । परिवज्जिया य सम्मं, सकजसिद्धि | व्व जिणदिक्खा ॥१९३॥ ता संपई नियकज, अहंपि साहेमि अज्जवि जियंतो । इय निच्छिऊण रना, सचिवो सद्दाविओ तुरियं ॥ १९४॥ अह सचिवो संपत्तो, नाउं विसवइयरं जहावत्थं । मंतोसहे कुणतो,पएसिरन्ना इमं भणिओ ॥१९५।। मुत्तूण सचिव! | अन्नोसहाइँ, धम्मोसहं कुणसु मज्झ । आहवसु सिग्घमित्थ य, सुहगुरुणो परमविज्जु व्य ॥१९६॥ सचिवो भणइ सविणयं, सामिय ! संपइ न संति इह गुरुणो । आह निवो गुरुकिरियं, तुमं पि में कारसु गुरु व्व।।१९७॥अह गीयत्थो मंती,जिणबिंब पूईऊण | दंसेइ । वंदाविऊण देवे, गरिहावई दुक्कडाइं च ।। १९८ ॥ आलोआवइ सम्मं,दुच्चरियं सिद्धसक्खियं सव्वं । कारेइ य जीवाणं, दिहादिट्ठाणं खामणयं ॥१९९॥ विसवेयणसंजयण,मूरियकंतापिय पइ अमच्चो । मिच्छादुक्कडदाणं,कारइ भूवाउ सविसेसं ॥२०॥ जमवस्स वेयणीय, नरगाइसु परवसेण नरनाह ! । तं कम्मनिटठवंती, एसा उवयारिणी तुज्झ २०१॥ कयसुकओ वि तुमं जइ, एईए उवरि धरसि संतावं । ता हारेसि सुवन्नं, धमिय इकाइ फुक्काए ।२०२॥ नरवर ! भवे अणंते,अणंतसो तिरियनारयाईसु । जीवेण भमंतेणं, दुक्खाई जाइँ सहियाई ॥२०३॥ तेसिमविक्खाइ इमो, न दुक्खलेसोवि इय मणे धरिनियकम्मणियमेयं, धीरो होऊण सह सव्वं ॥२०४॥ इय वुत्तूण अणसण , दाऊण वयाई उच्चरावेउं । आराहणं कराविय, सुसमाहिं पाविओ राया ॥२०५॥ ता पंच नमुक्कारं, समुच्चरंतो विसुद्धपरिणामो । सिरिकेसिपायपउमं, भत्तीए सरणमल्लीणो ॥२०६॥ देहं चइऊण तओ, स निवो सयमुवचिएहिँ पुन्नेहिं । दिव्वेहि तुरंगेहि व, पत्तो सोहम्मकप्पंमि ।। २०७ ॥ मूरीयाभविमाणे, उववाए सयणसंपुडे
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