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है| गहियव्वयाउ पत्ता. निययविहारेण तम्मि पुरे ॥ २३३ ॥ अह भद्दबाहुसामि, तत्थागंतूण बंदिउं विति । कत्थ पहु ! थूलभद्दो,
देउलियाइत्ति भणइ गुरू ॥ २३४ ॥ तो तव्वंदणहे उं, चलियाओ सोऽवि ताउ दट्ठणं । नियसत्तिं दंसेउ, सिंहस्स विउव्वए रूवं ॥ २३५ ।। अइ भीसणमुत्तिधरं, दटुं सिंहस्स तस्स रूवं तं । ताओ भयभीयाओ, साहति गुरूण गंतूण ॥ २३६ ॥ भयवं ! किं | जिट्टज्जो, गसिओ सिंहेण जेण तत्थ हरी। जिंभाईतो चिटइ, तो गुरू देइ उवओगं ॥२३७॥ भणइ य वंदह गंतुं, चिट्ठइ जिटुज्ज एव न उण हरी । तो पुणरवि पत्ताओ, पिक्खंति य थूलभद्दमुणिं ॥ २३८ ॥ तो वंदिय भत्तीए, उवविद्याओ कहति नियमद्धिं । सह सिरियएण अम्हे, पव्वइयाओ भवविरत्ता ॥ २३९ ॥ सिरिओ य अइछुहालू, काउं एक्कासपि न समत्यो । अन्नदिणे | पज्जुसणे, पयंपिओ सो मए एवं ॥ २४ ॥ अज्जो ! पज्जोसवणं, अज्ज तओ कुणसु पोरसिं ताव । तेणवि पच्चक्खाया, पुनाए तीइ पुण भणिओ ॥ २४१ ॥ पञ्चक्खसु पुरिमई, वंदसु जिणचेइयाइँ भद्द ! तुमं । अह सो तम्मिवि पुन्ने, तवलोभाओ मए भाणओ ॥ २४२ ॥ कुणसु अवई तम्मिवि, पुन्ने भणिओ समागया संझा । किं कुणसि अभत्तटुं ? सुत्तस्सवि वच्चिही रयणी ॥ २४३ ॥ तो मम उवरोहेणं, तह विहिए रयणिमज्झसमयम्मि । खीणम्मि आउयबले, सिरिओ पंचत्तमणुपत्तो ॥ २४४ ॥ पच्छा मह असमाही, जाया रिसिघाइणित्ति पावाऽहं । अह समणसंघ पुरओ, उवटिया पायछित्तकए ।। २४५ ॥ संघो भणइ अदोसा, तं सि तओ मह न देइ पच्छित्तं । भणियं च मए न हवइ, एवं मह माणससमाही ।। २४६ ॥ जइ मह केवलनाणी, कहइ सयं हवइ भोयणं ता मे । इय निबंधं नाउं, काउस्सग्गं कुणइ संघो ॥ २४७ ॥ तो संघपभावेणं, सासणदेवी भणेइ आगतुं । आइसउ मज्झ संघो, कज्जं तं जेण साहेमि ॥२४८ ॥ सा भणिया संघेणं, नेसु इमं संजई विदेहम्मि । सीमंधरजिणपासे,
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