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ARE एवं चिंतियमकज ॥ ८६ ॥ जह जळही सलिछेहि, दुप्पूरो इंधणेहि जलणो वा । तह. एसोऽनि हु अप्पा, पहुएहि प्रकरणम
विसयसुक्खेहि ॥ ८७ ॥ चइ कुलादि एसो, रत्तो एआइ अह धणासाए । संपत्तो मह पासे, मए वि पुण एरिसं वि. हियं ॥ ८८ ॥ ता को अप्पवसप्पा, निवसइ संसारचारए इत्थ । जत्थ चलंति अठाणे, मइओ अम्हारिसागंपि ॥८९॥ इच्चाइ भावणाजल-पक्खालिअकम्मकद्दमो सोऽवि । आरुहिय खवगसेडिं, संजाओ केवलनाणी।।१०॥अह तेसि चउण्हं| पि हु, अप्पडिहयनाणमुणियतिजयाणं । एसा ठिइ ति सासण-देवी अप्पेइ मुणिवेसं ॥ ९१ ॥ आसन्नवतरेहिं तच्चरियन चमक्किएहि अह तत्थ । स इलामुयस्स वसो, सुवन्नकमलीको सहसा ॥ ९२ ॥ तत्तो तत्थासीणो, पडिबोहत्यं समत्या लोयाण । स्वइसइ इलापुत्तो, एवं नियन्वभवचरियं ॥ ९३ ॥ नयरंमि वसंतउरे, आसि दिओ अग्गिसम्म नामेण । जो सच्छंदमईवि हु, गुरुजणाणं न लंघेइ ॥९४॥ अह सो कयाइ धम्मं, सोऊणं सुगुरुपायमूलम्मि । पडिवज्जइ पधज्ज, पढइ य मुत्तं च उवउत्तो ॥ ९५ ॥ तन्मज्जावि हु दिक्ख, गिण्डइ पइणोऽणुरागसंगेण । तो साहुणीसमीवे, सावि हुविहिणा मुयं पढइ ॥ ९६ ॥ अह अग्गिसम्मसमणो. न मुयइ भज्जाइ उपरि अणुरायं । सावि पुण बंभणी हं, इय || जाइमयं सया धरइ ॥९७॥ तत्तो य अणालोइयअपडिकताइ अणसणं काउं । उप्पन्नाई दुनिवि 'वेमाणियदेवमज्झम्मि | ॥९८॥ सो अग्गिसम्मजीवो, चविऊण अहं इलामुओ जाओ । भज्ज्वाय जाइमयओ, एसा जाया नडी मइला ॥२९॥ | तो भज्जानेहेणं, पुष्वमणालोइएण नडिओ हं । इत्तियकालं संपइ, पुण सुद्धो भावणावसओ ॥ १००॥ इय अच्छेरयभूयं, * सोउं दटुं च तेसि परियमिमं । पडिबुद्धो तत्थ जणो, भावणयम्मुज्जुओ जाओ ॥१०१॥ इलासुतस्त्यक्त्तगृहिवतोऽपि,