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________________ उत्तराध्ययन ॥३१४॥ द्वात्रिंशमध्ययनम्. (३२) गा ९६ दुही दुरंते । एवं अदत्ताणि समाययंतो, भावे अतित्तो दुहिओ आणिस्सो ॥ ९६ ॥ भावाणुरत्तस्स नरस्स एवं, कत्तो सुहं होज कयाइ किंचि । तत्थोवभोगेवि किलेसदुक्खं, निवसए जस्स कए ण दुक्खं ॥ ९७ ॥ एमेव भावंमि गओ पओसं, उवेइ दुक्खोहपरंपराओ। पदचित्तो अ चिणाइ कम्म, जं से पुणो होड दहं विवागे॥९॥ व्याख्या-भावेऽनभीष्टस्मरणाद्यात्मकेऽनिष्टवस्तुगोचरे वा गतः प्रद्वेष, विस्मरतु ममास्य नामापीत्यादिकम् ॥१९॥ मूलम्-भावे विरत्तो मणुओ विसोगी, एएण दुक्खोहपरंपरेण । न लिप्पई भवमज्झेवि संतो, जलेण वा पुक्खरिणीपलासं ॥ ९९ ॥ ६॥ व्याख्या-भावे इष्टानिष्टस्मरणात्मके रम्यारम्यवस्तुगोचरे वा अरक्तोऽद्विष्टश्चेति अष्टससति सूत्रावयवार्थः ॥९९॥ उक्तमेवार्थ संक्षेपेणाह मूलम्-एविंदियत्था य मणस्स अत्था, दुक्खस्स हेऊ मणअस्स रागिणो। ते चेव थोपि कयाइ दुक्खं, न वीअरागस्स करिति किंचि ॥ १० ॥ व्याख्या-एवमुक्तप्रकारेण इन्द्रियार्था रूपादयः, चस्य भिन्नक्रमत्वात् मनसोऽर्थाश्च स्मरणादयः, उपलक्षणत्वात् UTR-3
SR No.600340
Book TitleUttaradhyayanam Sutram Part 03
Original Sutra AuthorN/A
AuthorChandraguptasuri
PublisherAnekant Prakashan Jain Religious Trust
Publication Year2010
Total Pages428
LanguageSanskrit
ClassificationManuscript & agam_uttaradhyayan
File Size28 MB
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