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उत्तराध्ययन ॥३०४॥
द्वात्रिंशमध्ययनम्. (३२) गा४४-५०
दुही दुरंते । एवं अदत्ताणि समाययंतो, सद्दे अतित्तो दुहिओ अणिस्सो ॥४४॥ सदाणुरत्तस्स नरस्स एवं, कत्तो सुहं होज कयाइ किंचि । तत्थोवभोगेवि किलेसदुक्खं, निवत्तई जस्स कए ण दुक्खं ॥ ४५ ॥ एमेव सदंमि गओ पओसं, उवेइ दुक्खोहपरंपराओ। पदुट्ठचित्तो अ चिणाइ कम्मं, जं से पुणो होइ दुहं विवागे ॥ ४६॥ सद्दे विरत्तो मणुओ विसोगो, एएण दुक्खोहपरंपरेण । न लिप्पई भवमज्झेवि संतो, जलेण वा पुक्खरिणीपलासं ॥४७॥२॥ घाणस्स गंधं गहणं वयंति, तं रागहेउं तु मणुण्णमाहु । तं दोसहेडं अमणुण्णमाहु, समोअजो तेसु सवीअरागो ॥४८॥ गंधस्स घाणं गहणं वयंति, घाणस्स गंधं गहणं वयंति । तं रागहेउं तु मणुण्णमाहु, दोसस्स हेडं अमणुण्णमाहु ॥ ४९ ॥ गंधेसु जो गिद्धिमुवेइ तिवं, अकालिअं पावइ से विणासं । रागाउरे ओसहिगंधगिद्धे, सप्पे बिलाओ विव निक्खमंते ॥५०॥
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