________________ / / 180 // किमु क्षीरा-म्भोधिरुलवतेऽवधिम् ? // 167 // भवादृशा अपि यदा, कुर्वन्त्येवमनीदृशम् // दृढधर्मा जगति क-स्तदा बन्यो भविष्यति // 168 // तदुराचरितं सर्व-मालोच्येदं महाधियः! // समाचरत चारित्रं, कर्मकक्षहुताशनम् // 169 // गीर्वाणवाणीं श्रुत्वेति, प्रतिबुद्धो महाशयः // स सूरिः खदुराचारं, भूयो भूयो निनिन्द तम् // 17 // वारं वारं च तं देव-मार्याषाढोऽब्रवीदिति // साधु साधु त्वया वत्स !, बोधितोहं महामते ! // 171 // अहं हि नरकाध्वानं, प्रपन्नोऽपि स्वकर्मभिः // मोक्षमार्ग त्वयैवाऽथ, प्रापितो भावबन्धुना // 172 // धर्माद्दष्टस्य मे भूयो, धर्मदानविधायिनः // तवाऽनृणोऽहं नैव स्वां, ब्रवीमि किमतः परम् ? // 173 // तं देवमभिनन्येति, स्वस्थानमगमदुरुः // आलोचितप्रतिक्रान्त-स्तपोत्युग्रं चकार च // 174 // सुरोऽपि सूरिं नत्वा तं, प्रमोदभरमेदुरः // क्षमयित्वा खापराध, सुरलोकमगात्पुनः // 175 // नाषाढसूरिरिति दर्शनगोचरं प्राक्, सेहे परीषहममुं न तथा विधेयम् // सूरिः स एव सहते स्म यथा च पश्चा-त्सर्वैस्तथा व्रतिवरैः सततं स सह्यः॥ 176 // इति सम्यक्त्वपरीषहे श्रीआषाढाचार्यकथा // 22 // इत्युक्ता द्वाविंशतिः परीषहाः॥ नन्वते कस्मिन् कस्मिन्कर्मण्यन्तर्भवन्तीति चेदुच्यते-“दंसणमोहे दंसण-परीसहो पण्ण 1 नाण 2 पढमंमि // चरिमेलाभपरीसह, सत्तेव चरित्तमोहंमि // 1 // " अत्र ‘पढमंमित्ति' ज्ञानावरणे, 'चरिमेत्ति' अंतराये / अथ यदुक्तं सप्त चरित्रमोहे, इति तानाह-"अक्कोस 1 अरइ 2 इत्थी 3, निसीहिआ 4 अचेल 5 जायणा 6 चेव // सक्कार UTR-1