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________________ औत्पात्ति की नमस्कार धरेति णवित्ति , सो भणति- मम पंडरओ कागो अहिट्ठाण पविट्ठो, ताए सुहिज्जिताणं कहितं जाव रण्णा सुयं, पुच्छितो, कहियं, व्याख्यायांना रण्णा से सुकं मुक्क, मंती य निउत्तो । ततिओ विट्ठविक्खरणे भागवतो खुडग पुच्छति, खुड्डगो भणति- एस चिंतेति- एत्थर विण्हू अस्थि णस्थित्ति ।। उच्चारे, धिज्जातियस्स भज्जा तरुणी, गामंतरं णिज्जमाणी धुत्तेण समं लग्गा, गामे ववहारो, विभत्ताणि पुच्छिताणि, | आहारविरेयणं दिणं, तिल्लमोदगा, इयरो धाडिओ। ___ गये, हत्थी महतिमहालओ जो तोलति तस्स सतसहस्सं देमि, णावाए तोलति, लंछित्ता णावाए उत्तारितूण पाहाणाणं 8 भरिया, जाव से लेहा, पाहाणा तोलिया, एत्तिय तुलति, जितो। घतणो भंडो सव्वरहस्सितो, राया देवीय गुणे कहेति-णिरामयं, सो भणति- ण भवति, किह ?, जया पुप्फाणि केसवाते ढोएति, तहत्ति विण्णासियं, ग़ाए हसिय, णिबंधे कहियं, णिव्विसओ, सुणति, उवाहणाण भारेण उवद्वितो, उड्डाहभीताए रुद्धो। गोलओ णक्कं पविट्ठो जतुमतो,सलागाए तावेत्ता कड्डितो। खंभो तलागमज्झे, जो तडे संतओ बंधति तस्स सयसहस्सयं दिज्जति, तमेव खोलग बंधितूण पडिबंधितूण बद्धो, जितो । खुड्डए, पारिवाइया भणति- जो जं करेति तं मए कायव्वं कुसलकम्म, खड्डओ गतो भिक्खस्स, पडहओ वारितो, गओ राउलं, दिट्ठा, सा भणति-कतो गिले १, तेण सागारियं दातियं, जिया, काइएण य पउमं लिहिय, सा न तरति, जिता। SHRANAGLASS ॥५४८॥
SR No.600290
Book TitleAavashyak Sutram Purv Bhag
Original Sutra AuthorBhadrabahuswami, Jindasgani Mahattar
Author
PublisherRushabhdevji Keshrimalji Shwetambar Samstha
Publication Year1928
Total Pages620
LanguageSanskrit
ClassificationManuscript & agam_aavashyak
File Size13 MB
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