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________________ सुव्रतादि श्रीआचारांग सूत्र चूर्णिः ॥२३२॥ raiminine सम्म उठाए समुट्ठाए, ण मिच्छोवढाए, गोविंदवत्, अविहिंसगा सुबता दंता सच्चवादी जाव संतुद्वा सोभणाणि वताणि । तेसिं सुव्वता, तवजुत्ता इंदियनोइंदियदंता, णागज्जुण्णा ते-समणा भविस्सामो अणगारा अकिंचणा अपुत्ता अपसू। अविहिंसगा सुब्बता दंता परदत्तभोइणो पावकम्मं णो करिस्सामोसमुहाए एवं महईए पइण्णं तरित्ता सियावित्ता विहारिणो अधणंतरे, एगेण सव्वे, पासंडी णेव सीहि अणुदारसत्तत्ताए, परीसहपराजिते उड़े परतित्तिसत्ता उप्पइत्ता, आमरणंताए संजमट्ठाणे हिच्चा गारवदोसाओ पुणो पडिवयमाणे, कत्थ ?-अविरतीए गिहवासचारए वा, पडिवयमाणो पडिते य, वस-| हिकायरा जणावासे वटुंतीति, वसही केसि ?, इंदियवसहगारवाणं अत्थित्ते आदारे, जेसिं कायरा य दुक्खं भवति, ण तवसूरा, जाइंति जाइस्संति य जाणंति वा कम्माणि जणा, अहवा जणा इति साहू, ते पडिभग्गा समणा ण साहू जणा वुचंति, काउं दुद्धराणि अट्ठारससीलंगसहस्साणि धारेस्सतीति दवलिंगस्स भावलिंगस्स लूसगा भवंति, तेसिं वयाणं, केई दरिसणस्सवि 'अहमेगेसिं लोए पावए भवति' अह तेसिं भग्गवयाणं भग्गउच्छहाणं भग्गपरकमाणं गारववसोते उप्पजयित्वाणं, पंसेति पातेति वा पावगं असिलोगो, अहमेसो, सो तु सपक्खाओ परपक्खाओ तहा, सपक्खं परपक्खं वा, तत्थ ताव परपक्खाओ परोक्खं जति तं कोइ पसंसति सुतेण वा जातीए वा तो भणति-धिरत्थु या, तेसि तु तस्स उवदेसे ण वट्टति, 'जहा खरोचंदणभारवाही भारस्स | |भागीण हुचंदणस्स', हीणं से जाति कुलं वा, मा एतस्स कुलफंसणस्स णामपि गिण्हाहि, असिक्खिगिज्झस्स पव्वइंसु, उप्पबइयाणं देवावि बीभेति, जेवि समविस्समियाहिं धम्म करेंति, एवं सक्खमवि केइ भणंति, विवातउग्गहादिसु रोसिता अरोसिता वा मुकत्थं भणंति, अण्णं परावतेंति, आदिवाणि ज्झायंति, चप्पुडियं देति, तमि य आगते परिसमझाओ पंतीओ वा उद्देति सप- | MARA ॥२३२॥
SR No.600285
Book TitleAcharang Churni
Original Sutra AuthorJindasgani Mahattar
Author
PublisherRushabhdevji Keshrimalji Shwetambar Samstha
Publication Year1941
Total Pages384
LanguageSanskrit
ClassificationManuscript & agam_acharang
File Size9 MB
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