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________________ m श्रीआचारांग सूत्र चूर्णिः ॥ ९९॥ , ज. अहे ति तिरियं दिसाणापरिणा पञ्चमणा दुविज्ञा-मूलाश, जंभणित - - णिज्जो पसंसिते, अण्णेऽवि अपसत्थसंगामवीरा, ण ते पसंसिता, भाववीरो पसंसितो, जो किं करेति ?, भणति-"जे बढे पडि-10 बद्धमोच| मोयए' जे इति अणुद्दिद्वस्स गहणं, अट्ठप्रकारेण कम्मेण बद्धे संते पडिमोएइ आयप्पओगेण बद्धे सम्म उवदेसंतो, कारणे कज्जु- नादि वयारे संपयं पडिमोएति, जं भणितं-पडिमोयावेति, तित्थगरो जो य कयत्थो उत्तमो, गणहराति वा थेरा उभयतारा इति, एवं से | जहाभणितकहणाविधिजुत्ता 'उडू अहे तिरियं' पण्णवगदिसा पडुच्च उई वा अहे वा तिरियं वा चउसुवि दिसासु 'से सवतो' स इति पुब्वभणितो कहगो, सबओ उ९ अहे तिरियं दिसासु, ण तस्स कम्मासबो कतोयिवि भवति, 'सबपरिणाचारित्ति सव्वकालं सबभावे सब्बआतपदेसेहिं, परिण्णा दुविहा-जाणणापरिण्णा पच्चक्वाणपरिण्णा य, जाणणापरिण्णा दुविदा-केवलिया छाउमत्थिया य, छाउमत्थिगी चउबिहा, केवलिगी एगविहा, पच्चक्खाणपरिण्णा दुविहा-मूलगुणपञ्चक्वाणपरिण्णा उत्तरगुणपञ्चक्खाणपरिण्णा य इति, एवं सवपरिणं सब्बओ परिजाणित्ता चरति सम्बतो सबपरिणचारी, जं भणितं जाणित्ता असंजमजोगे ण करेति, अहवा अविहिकहणादोसे विहिकहणागुणे य सबओ सन्त्रपरिणचारी, णच्चा अविहिकहणं पचक्खाइत्ता चरतीति सवपरिण्णचारी, सो एवं 'ण लिप्पति' ण पडिसेहे, लिप्पतित्ति जुञ्जति, छणणं हिंसा छणणस्स पदं छणणपदं, जं भणितंहिंसापदं, विहीए कहेंतो ण छणेण लिप्पति, तं णो अकुस्सेज वा उद्धंसेजेज वा उवहसेज वा नो वत्थादि अवहरिज वा, सो एवं विहीए कहेंतो नाणदंसणचरित्ततवविणयेहिं ण छलिज्जति, तथा तारिसं धम्मं न कहेति जेण पाणभूयाणं छगणा होजा, जहा अन्नउत्थिया एगंतेण उद्देसियामिहाणं पसंसंति विहाराति कारेंति एवमादी, वीरो पुचभणितो, किं एत्तियं वीरलक्खणं जोण लिप्पति छणणपदेण, उदाहु अन्नपि ?, भण्णति 'से मेहावी' मेहया धावतीति मेधावी, सो बुद्धिमा, जो 'अणुग्धामणस्स'अणति जेणं iill||९९ ॥
SR No.600285
Book TitleAcharang Churni
Original Sutra AuthorJindasgani Mahattar
Author
PublisherRushabhdevji Keshrimalji Shwetambar Samstha
Publication Year1941
Total Pages384
LanguageSanskrit
ClassificationManuscript & agam_acharang
File Size9 MB
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