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२ कामदेवाध्ययन
उपासकदशांग सानुवाद ॥१६॥
॥१६॥
णिए सम्म सहित्तए जाव अहियासित्तए। तओ ते बहवे समणा निग्गन्था य निग्गन्थीओ य समणस्स भग-| वओ महावीरस्स तहत्ति एयमढे विणएणं पडिसुणन्ति । तए णं से कामदेवे समणोवासए हट्ट जाव समणं | भगवं महावीरं पसिणाई पुच्छइ, अट्ठमादियइ, समणं भगवं महावीरं तिक्खुत्तो वन्दइ नमसइ, वंदित्ता नमंसित्ता जामेव दिसिं पाउन्भूए तामेव दिसिं पडिगए।तए णं समणे भगवं महावीरे अन्नया कयाइ चम्पाओ पडिणिक्खमइ, पडिनिक्खमित्ता बहिया जणवयविहार विहरद ॥
९. तए णं से कामदेवे समणोवासए पढम उवासगपडिम उवसम्पज्जित्ताणं विहरइ, तए णं से कामदेवे श्रमण भगवंत महावीरना ए अर्थने 'तहत्ति कही विनय वडे स्वीकारे छे. त्यार पछी हृष्ट-प्रसन्न थइ यावत् श्रमण भगवंत महावीरने प्रश्नो पूछे छे, तेनो अर्थ ग्रहण करे छे, अने श्रमण भगवंत महावीरने त्रण वार वदन-नमस्कार करे छे. वंदन नमस्कार करीने जे दिशामांथी आव्यो हतो ते दिशामां पाछो जाय छे. त्यार बाद श्रमण भगवान् महावीर अन्य कोई दिवसे चम्पा नगरीथी नीकळे छे अने नीकळी बहार देशोमां विहार करे छे. ।।
९. ते पछी कामदेव श्रमणोपासक प्रथम श्रावकनी प्रतिमाने अंगीकार करीने विहरे छे. त्यार बाद ते कामदेव श्रमणोपासक घणा शीलवत वगेरेथी आत्माने भावित करी वीश चरस सुधी श्रमणोपासक पर्यायने पाळी, अगियार श्रावकनी प्रतिमाओने सम्यक्ए बधा एकार्थक छे. तेनी विशेषता पण बतावेली छे से अन्य ग्रन्थथी जाणी लेवु.
'निक्खेवओ' त्ति निगमन-उपसंहारवाक्य छ. ते आ प्रमाणे-'एवं खलु जम्बू ! समणेणं जाव संपत्तेणं दोच्चस्स अज्झयणस्स