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उपासकदशांग सानुवाद
१ आनंदाध्ययन
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॥५०॥
४ उवक्खडेउ वा उबकरेउ वा । तए णं से आणन्दे समणोवासए जेट्टपुत्तं मित्तनाई आपुच्छइ, आपुच्छित्ता सयाओ गिहाओ पडिणिक्खमइ, पडिनिक्खमित्ता वाणियगामं नयरं मझमज्झेणं निग्गच्छइ, निग्गच्छित्ता जेणेव कोल्लाए सन्निवेसे जेणेव नायकुले जेणेव पोसहसाला तेणेव उवागच्छइ, उवागच्छित्ता पोसहसालं पमजइ, पमज्जित्ता उच्चारपासवणभूमि पडिलेहेइ, पडिलेहित्ता दब्भसंथारयं संथरइ, दम्भसंथारयं दुरूहइ, दुरूहित्ता पोसहसालाए पोसहिए दम्भसंथारोवगए समणस्स भगवओ. महावीरस्स अन्तियं धम्मपण्णत्ति उवसम्पज्जित्ता णं विहरइ ।। |रंभीने बहु कार्योमा मने पूछशो नही, वारंवार पूछशो नहि. अने मारा माटे अशन, पान, खादिम स्वादिम, तैयार करशो नहि, तेनो | संस्कार करशो नहि". त्यार बाद आनन्द श्रावक ज्येष्ठ पुत्र अने मित्र ज्ञाति वगेरेनी रजा ले छे, रजा लइने पोताना घरथी नीकळे छे. नीकळीने वाणिज्य गामना मध्य भागमां थइने ज्यां कोल्लाक नामे संनिवेश छे, ज्या ज्ञात कुल छे अने ज्यां पोषधशाला छे, त्यां आवे छे, आवीने पोषधशाला प्रमार्जे छे, प्रमार्जीने उच्चार-दिशाए जवानी अने प्रस्रवणभूमि-पेसाब करवानी जग्याने जुए छे, जोइने डाभनो संथारो पाथरे छे, पाथरीने तेना उपर बेसे छे, बेसीने पोषधशालामा पोषध ग्रहण करी डाभना संथाराने प्राप्त थइ श्रमण भगवंत महावीरनी पासे ग्रहण करेली धर्मप्रज्ञप्तिनो स्वीकार करी विहरे छे. ' भूमिने जोइने डाभनो संथारो पाथरी ते उपर बेसी पोषधवत ग्रहण करी अभना संथारा उपर बेठेल आनंद श्रावक भगवंत महावीरनी पासे स्वीकारेल धर्मप्रज्ञापनाने अनुष्ठान द्वारा अंगीकार करीने विहरे छे.