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उपासकदशांग सानुवाद
|१ आनंदा
ध्ययन
॥४७॥
॥४७॥
आणन्दस्सऽवि समणोवासगस्स चत्तारि पलिओवमाई ठिई पण्णत्ता। तए णं समणे भगवं महावीरे अन्नया कयाइ बहिया जाव विहरइ । तए णं से आणन्दे समणोवासए जाए अभिगयजीवाजीवे जाव पडिलाभेमाणे | विहरइ । तए णं सा सिवनन्दा भारिया समणोवासिया जाया जाव पडिलामेमाणी विहरइ॥
१०. तए णं तस्स आणन्दस्स समणोवासगस्स उच्चावएहिं सीलब्बयगुणवेरमणपचक्स्वाणपोसहोववासेहिं अप्पाणं भावेमाणस्स चोइस संवच्छराइं वइकन्ताइं, पण्णरसमस संवच्छरस्स अन्तरा वट्टमाणस्स अन्नया कयाइ पुब्वरत्तावरत्तकालसमयंसि धम्मजागरियं जागरमाणस्स इमेयारूवे अज्झथिए चिन्तिए पत्थिए मणोगए सङ्कप्पे समुप्पज्जित्था-'एवं खलु अहं वाणियगामे नयरे बहणं राईसर० जाव सयस्सवि य णं कुडुम्बस्स जाव चार पल्योपमनी स्थिति कही छे. त्यार बाद श्रमण भगवंत महावीर अन्य कोई दिवसे बहारना देशोमा विहार करे छे. ते पछी जीव अजीव तत्व जेणे जाणेला छे एवो आनन्द श्रावक यावत् श्रमण निर्ग्रन्थनो अशनादि बडे सत्कार करतो विहरे छे. ते शिवनन्दा भार्या श्राविका थइ अने श्रमण निग्रन्थनो सत्कार करती विहरे छे.
१०. त्यार पछी आनन्द श्रावकना अनेक प्रकारना शीलव्रत, गुणव्रत, विरमगवत, प्रत्याख्यान अने पोषधोपवास वडे आत्माने भावित करतां चौद वर्ष व्यतीत थयां अने पंदरमा वर्षना मध्य भागमा वर्तता अन्य कोई दिवसे मध्यरात्रिना समये धर्म जागरिका
१०. 'महावीरस्स अन्तियं' अन्ते भवा-अन्ते थयेली ते आन्तिकी-भगवंत महावीरनी पासे स्वीकारेली 'धम्मपण्णत्ति' धर्मप्रज्ञा| पनाने 'उपसंपद्य'-अनुष्ठान द्वारा स्वीकारीने वर्ती शकतो नथी. 'जहा पूरणों' जेम भगवती सूत्रमा कहेल बाल तपस्वी पूरण छे, तेणे