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________________ उपासकदशांग सानुवाद १ आनंदाध्ययन ॥४५॥ ॥४५॥ भगवओ महावीरस्स अन्तिए धम्मे निसन्ते, सेऽवि य धम्मे मे इच्छिए पडिच्छिए अभिरुइए, तं गच्छ णं तुम * देवाणुप्पिए ! समणं भगवं महावीरं वन्दाहि जाव पज्जुवासाहि, समणस्स भगवओ महावीरस्स अन्तिए पश्चाणुब्वइयं सत्तसिक्खावइयं दुवालसविहं गिहिधम्म पडिवजाहि ॥ ८. तए णं सा सिवनन्दा भारिया आणन्देणं समणोवासएणं एवं वुत्ता समाणा हहतुट्ठा कोडुम्बियपुरिसे सद्दावेइ, सहावेत्ता एवं वयासी-'खिप्पामेव लघुकरण जाव पज्जुवासंइ । तए णं समणे भगवं महावीरे सिव| नन्दाए तीसे य महइ० जाव धम्मं कहेइ । तए णं सा सिवनन्दा समणस्स भगवओ महावीरस्स अन्तिए धम्म मने रुचि थइ छे, ते माटे हे देवानुप्रिये ! तुं जा अने श्रमण भगवंत महावीरने वंदन कर, यावत् तेमनी पर्युपासना कर अने श्रमण भगवंत महावीरनी पासे पांच अणुव्रत अने सात शिक्षाबत रूप बार प्रकारना गृहस्थ धर्मनो स्वीकार कर." ८.त्यार बाद ते शिवनन्दा भार्या ते आनन्द श्रावके एम कडं एटले हर्षित अने प्रसन्न थइ कौटुम्बिक पुरुषोने बोलावे छे, बोलावीने तेणे ए प्रमाणे कडं-हे देवानुप्रियो ! जलदी लघुकरण-शीघ्र गमन करवामां निपुण इत्यादि वर्णनयुक्त बे बळदसहित श्रेष्ठ वाहनने हाजर करो, त्यार बाद ते श्रेष्ठ वाहनमां बेसीने जाय छे अने यावत् पर्युपासना करे छे. त्यार बाद श्रमण भगवंत महावीर शिव पात्र, कंबल, पादनोंछनक-पग साफ करवानुं वस्त्र, पीठ-पाट वगेरे, फलक-ओठींगण आपवा वगेरेनुं पाटीठ, औषध-दवा अने | भैषज्य-पथ्य वडे सत्कार करवा योग्य छे. त्यार बाद प्रश्नो पूछे अने तेना उत्तर रूप अर्थाने ग्रहण करे छे. ८'लहुकरण' अहीं यावत् शब्दनुं ग्रहण होवाथी 'लहुकरणजुत्तजोइय'-लघु-शीघ्र गमन क्रियामां दक्ष-निपुण अने यौगिक + +
SR No.600279
Book TitleUpasakdashanga Sutra
Original Sutra AuthorAbhaydevsuri
Author
PublisherAbhaydevsuri
Publication Year
Total Pages184
LanguageSanskrit
ClassificationManuscript & agam_upasakdasha
File Size15 MB
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