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________________ छ ज्ञाताधर्म कथामा ॥२८८॥ .. 'खलिणबंधेहि यत्ति खलिनै-कविकै; उवीलणेहि यत्ति अवपीडनाभिर्बन्धनविशेषैः पाठान्तरे अहिलाणेहिं' मुखबन्धनविशेषैः पडियाणएहि यत्ति पटतानकं पर्याणस्याधो यद्दीयति इति, शेषं प्राय: प्रसिद्धं २ ॥ सूत्रं १४०॥ अथेन्द्रियासंवृतानां स्वरूपस्येन्द्रियासंवरदोषस्य चाभिधायकं गाथाकदम्बकं वाचनान्तरेऽधिकमुपलभ्यते, तत्रकल-रिभिय-महुर-तंती-तल-ताल-वंस-कउहाभिरामेसु । सद्देसु रज्जमाणा रमंती सोइंदियवसट्टा ॥१॥ सोइंदिय-दुद्दन्तत्तणस्स अह एत्तिओ हवति दोसो। दीविगरुय-मसहंतो वहबंधं तित्तिरो पत्तो ॥२॥ थण-जहण-वयण-कर-चरण-णयण-गव्विय-विलासिय-गतीसु । रूवेसु रज्जमाणा रमंति चक्खिदियवसट्टा ॥३॥ चक्खिदिय-दुइंतत्तणस्स अह एत्तिओ भवति दोसो। जं जलणंमि जलंते पडति पयंगो अबुद्धीओ ॥४॥ अगुरु-वर-पवर-धूवण-उउय-मल्लाणुलेबण-विहीसु। गंधेसु रज्जमाणा रमंति घाणिदियवसट्टा ॥५॥ घाणिदियदुइंतत्तणस्स अह एत्तिओ हवइ दोसो। जं ओसहिगंधेणं बिलाओ निद्धावती उरगो ॥६॥ तित्तकडयं कसायब महरं बहखज्ज-पेज्जलेज्झेस। आसायंमि उ गिद्धा रमंति जिभिदियवसट्टा ॥७॥ जिभिदिय-दुदंतत्तणस्स अह एत्तिओ हवइ दोसो। जंगललग्गुक्खित्तो फुरइ थलविरल्लिओ मच्छो ॥८॥ उउभयमाणसुहेहि य सविभव-हियय-गमण-निव्वुइकरेसु । फासेसु रज्जमाणा रमंति फासिदिय-वसट्टा ॥९॥ फासिंदिय-दुईतत्तणस्स अह एत्तिओ हवइ दोसो। जं खणइ मत्थयं कुंजरस्स लोहंकुसो तिक्खो ॥१०॥ कल-रिभिय-महुर-तंती-तल-ताल-वंस-कउहाभिरामेसु । सद्देसु जे न गिद्धा वसट्टमरणं न ते मरए ॥११॥ थण-जहण-वयण-कर-चरण-नयण-गब्विय-विलासिय-गतीसु । रूवेसु जे न रत्ता वसट्टमरणं न ते मरए ॥१२॥ अगरु-वर-पवर-धूवण-उउय-मल्लाणुलेवण-विहीसु । गंधेसु जे न गिद्धा वसट्टमरणं न ते मरए ॥१३॥ तित्तकडुयं कसायं व महुरं बहुखज्ज-पेज्जलेज्झेसु । आसाये जे न गिद्धा वसट्टमरणं न ते मरए ॥१४॥ उउ-भयमाण-सुहेसु य सविभव-हिययमणणिव्बुइकरेसु । फासेसु जे न गिद्धा वसट्टमरणं न ते मरए ॥१५॥ सद्देसु य भद्दयपावएसु सोयविसयं उवगएसु । तुट्टेण व रुटेण व समणेण सया ण होयव्वं ॥१६॥ ||२८८॥
SR No.600272
Book TitleGnata Dharmkathangasutram
Original Sutra AuthorJinendrasuri
Author
PublisherHarshpushpamrut Jain Granthmala
Publication Year
Total Pages320
LanguageSanskrit
ClassificationManuscript & agam_gyatadharmkatha
File Size9 MB
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