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________________ श्रीउपदे ७०॥ - मुक्का ॥४५।। पत्ता रक्खसपासे सिट्टो से मालियस्स वुत्तंतो। अव्वो महप्पभावा एसा, जा उज्झिया तेण ॥४६॥ विनय विशपदे इइ भावितेणं निवडिऊण पाएसु तेणवि विमुक्का । चोरसमीवे य गया सिट्ठो तह पुववृत्तंतो ॥४७॥ तेहिं वि षये श्रेणिक अणप्पमाहप्पदंसणुप्पन्नपक्खवाएहिं । सालंकारच्चिय वंदिऊण सगिहम्मि पट्टविया ॥४८।। अह आभरणसमेया अक्ख निदर्शनम. यदेहा अभग्गसीला य। पत्ता पइस्स पासे कहियं सव्वं जहावित्तं ॥४९।। परितुटुमणेण समं तेण पसुत्ता समत्थर।।७०।- यणिपि । जाए पभायसमए चिंतियमिय मंतिपुत्तेण ।।५०।। छंदट्ठियं सुरूवं समसुहदुक्खं अणिग्गयरहस्सं। धण्णा । सुत्तविबुद्धा मित्त महिलं च पेच्छंति ॥५१।। इय भावे तेण कया घरस्स सा सामिणी समग्गस्स । किं व न कीरई | निक्कवडपेम्मपडिबद्ध हिययम्मि ? ॥५२।। इय पइतक्कररक्खसमालागाराण मज्झओ केणं । तचागेणं कय दुक्करं ति भो H मज्झ साहेह ? ॥५३ ईसालुएहिं भणियं सामी ! पइणा सुदुक्करं विहियं । परपुरिससमोवे जेण पेसिया सव्वरीइ। पिया ।।५४॥ भणियं छुहालुएहि सुदुक्करं चेव रक्खसेण कयं । जेण चिरं छुहिएण वि न भक्खिया भक्खणिज्जावि | ॥५५।। अह पारदारिएहि पयंपियं देव ! मालिओ एको । दुक्करकारी जेणं चत्ता सा निसि सयं पत्ता ।।५६।। पाणेण जंपियं होउ ताव चोरेहिं दुकरं विहियं । 'पइरिकेवि विमुक्का ससुवन्ना जेहिं सा तइया ॥५॥ एवं वुत्ते । चोरो त्ति निच्छिओ सोऽभएण मायंगो। गिहाविऊण पुट्ठो कहमारामो विलुत्तो त्ति ।।५८।। तेणं पयंपियं नाह ! नवरं विज्जाबलेण नियएण। कहिओ य वइयरो सेणियस्स एसो समग्गोवि ।।५९।। रण्णावि संसियं देइ मज्झ जइ कहवि निययविजाओ। सो पाणो तो मुंह इहरा से हरह जीयं ति ॥६०।। पडिवन्नं पाणेणं विज्जादाणंपि, अह
SR No.600268
Book TitleUpdeshpad Mahagranth Satik Part 01
Original Sutra AuthorJinendrasuri
Author
PublisherHarshpushpamrut Jain Granthmala
Publication Year1989
Total Pages438
LanguageSanskrit
ClassificationManuscript
File Size8 MB
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