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________________ उपदे द- शपदे **RA ॥४८॥ मज्झ समीहियकरा भवेजेसा ? । आढत्तो दाणाई उवयारोऽणेगहा तीए ।।१०।। उवयारमेत्तगज्झा गणियाओ जेण तेण ५-६ रत्नसो तीए आणीओ बहुमाणस्स गोयरं दावियसिणेहो ।।११।। वरचित्तभित्तिकलिए निम्मलमणिभूमिए सउल्लोचे । स्वप्न-निद र्शने। पजलियरयणदीवयपहागलत्थितिमिरपूरे ।।१२।। कयउभडसिंगारो पओससमए य वासभवणे सो । पत्तो पडिवण्णो आसणाइदाणेण सो तीए ॥१३।। एवं तेण समं सा गमेइ कालं विसालभोगपरा। परमञ्चंतसिणेहा णिचं चिय मूलदेवम्मि ।।१४।। अकाभएण एसा न पवेसई तं नियम्मि गेहम्मि । खिजेई किंचि चित्ते णाओ जणणीइ तब्भावो ।।१५।। भणिया पुत्ति ! पवेससु जो रुचई तुज्झ झरसि किमवं? । समए पवेसिओ सो भणिओ अक्काई तो एवं ।।१६।। "अपात्रे रमते नारी गिरौ वर्षति माधवः । नीचमाश्रयते लक्ष्मीः प्राज्ञःप्रायेण निर्धनः ।।१।।" पभणेइ देवदत्ता नाहं लुद्धा धणम्मि किंतु गुणे । सो उ गुणो सव्वा चिय निवसइ इह मूलदेवम्मि ।।१७।। भणिया जणणीए सा अणेगगुणगणसमण्णिओ अयलो। तत्तो तुह प्पियाओ सा पभणई कीरउ परिच्छा ।।१८।। तो अयलस्स समीवे दासी संपे- * सिया जहा भणसु। तुह वल्लहाइ जायं उच्छृणं भक्खणे चाजं ।।१९।। तप्पत्थणाइ सोहग्गियाणमग्गेसरं मुणंतो सो। अप्पाणमणेगाइं संपेसइ उच्छुसग डाई ।।२०।। भणिया जणणीए सा अचलस्सोदारयं तुम पिच्छ। एकवयणेण जेणं |* महत्वओ एरिसो विहिओ ।।२१।। सविसायं सा भासइ किमहं करिणी जमेवमुवणेइ । असमारइयाउ इमा समूलडालाउ लट्ठीओ ।।२२।। तो भणस मूलदेवं कि काही सावि ताव पिच्छामो। पहिया चेडी जाणाविओ य सो जयखलयम्मि ।।२३।। तत्तो तेण कवड्डे धेत्तूणं दस दुगेण तम्मज्झा । गहिया दो लट्ठीओ दुगेण दो अहिनवसरावे ॥४८.।।
SR No.600268
Book TitleUpdeshpad Mahagranth Satik Part 01
Original Sutra AuthorJinendrasuri
Author
PublisherHarshpushpamrut Jain Granthmala
Publication Year1989
Total Pages438
LanguageSanskrit
ClassificationManuscript
File Size8 MB
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