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________________ K****XXXXXXXXXXXXXX चाणको इय नाम सम्वत्थ पसिद्धिमारूढं ॥६।। सुपसत्थलक्खणधरो कमेण सो वडिउ समाढत्तो। उम्मुकबालभावेण तेण विजाण ठाणाणि ।।७।। पढियाणि सावगत्तं सो पडिवन्नो भवाओ निम्विन्नो । अणुरूवा अइभद्दयमाहणवंसुग्गया तेण ॥८॥ परिणीया एगा कन्नगा य संतुट्ठमाणसो धणियं । चिट्ठइ निठुरसानजकञ्जपरिवजणुज्जुत्तो।।९।। अह अन्नया कयाइ सा भजा तस्स उच्छववसेण । माइगिहम्मि अइगया अइबहकालाओ पणयपरा ॥१०॥ अन्नाओ भगिणीओ समागयाओ परं समिसु । परिणीयाउ कुलेसुं पोढालंकारसाराओ ॥११॥ हरइ परिहीणविहवस्स नणं नियपणइणीवि अप्पाणं । सव्वंगमसंपुन्नस्स घडइ कि जामिणी ससिणो ।।१२।। इय वयणमण्णुसरंतेण तेण सब्वेण परियणेण इमा । निद्धणपइतणाओऽवमाणणिज्जा कया दूरं ॥१३॥ सेसाओ पुप्फतंबोलवसणसिंगारचं गियंगीओ। घरदेवयव्व बाढं लद्धप्पसरा परिभमंति ॥१४॥ जाया अधिई कह एगमाइपिउगावि परिहरं पत्ता। मोत्तूण विहवमेगं न वल्लहो कोवि कस्सावि ? ॥१५॥ इय हिययधरियमच चाणक्कगिहे समागया रुयइ । सानिब्बंधम्मि कए कहेइ से सव्वुत्तंतं ॥१६॥ थीपरिभवो असझोत्ति तक्खणा धणगवेसगो जाओ। नंदो पाडलिपुत्ते तइया दियदक्खिणं देइ ।।१७।। स गओ तत्थ तया पुण पुविल्लाणं कमेण नंदाणं । कत्तियचरिमतिहीए वित्थिण्णा आसणा सव्वे ।।१८।। जं पढममासणं तत्थ लग्गसुद्धि तहाविहं कलिउ । सो सहसा उवविट्ठो भणियं तो सिद्धपुत्तेण ।।१९।। नंदेण समं तत्थागएण एएण माहणेण तुहं । वंसच्छायं सव्वं अक्कमिऊणं निविटुंति ।।२०॥ भणिओ दासीए तओ भयवं! बीयम्मि आसणे निवस । अत्थित्ति भणिउ ठविया तेण निया कुंडिया तत्थ ॥२१॥ तइए दंडो तुरिए गणात्ति या बंभसुत्तु पंचमगे। एवं अक्कममाणो XXXXXXXXXXXX****** ॥२१५॥ ॥२१५॥ XXXXXXX
SR No.600268
Book TitleUpdeshpad Mahagranth Satik Part 01
Original Sutra AuthorJinendrasuri
Author
PublisherHarshpushpamrut Jain Granthmala
Publication Year1989
Total Pages438
LanguageSanskrit
ClassificationManuscript
File Size8 MB
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