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जिणिदसमयप्पईवसामत्था । ते नत्थि जं न नजइ कित्तियमेत्तं नरयवित्तं ॥११।। अवरसमए य निरसातीए जणणीए दंसिओ सग्गो। सुमिणम्मि विम्हयावहविभूइरेहंतसुरनियरो ।।१२।। पुटवं पिव पुणरवि पत्थिवेण ता जाब पुच्छिओ सुरी । तेणावि तस्स रूवं निवेइयं हरिसिया देवी ।।१३।। चलणेसु निवडिऊणं भत्तीए जंपिउं समाढत्ता। कह होज नरयदक्खं कह वा सुरसेोक्खसंपत्ति? ॥१४॥ गुरुणा भणियं भद्दे ! विसयपसत्तिपमोक्खपावेहि। पाविजइ नरयदुहं तच्चागेणं च सग्गसुहं ।।१५।। ताहे सा पडिबुद्धा विसंव मोत्तूण विसयवासंगं। पव्वजागहणत्थं आपुच्छइ पत्थिवं तत्तो ।।१६।। अन्नत्थ विहरियव्वं तुमए न कयावि इइ पइन्नाए। कहकहवि अणुनाया नरवइणा विरहविहुरेण ॥१७॥ घेत्तूण य पव्वजं विचित्ततव कम्मनिम्महियपावा। ओमंति दूरदेसे पेसियनीसेससीसस्स ।।१८।। जंघाबलपरिहीणस्स तस्स एगागिणो ठियस्स तहिं । सूरिस्स असणपाणं निवभवणाओ पणामेइ ।।१९।। एवं वच्चंतम्मी काले अच्छतसुद्धपरिणामा। निधुणियघाइकम्मा संपत्ता केवलालोयं ।।२०।। "पुव्वपवत्तं विणयं च केवली अमुणिओ न लंघेई"। इइ सा पुवकमेणं गुरुणो असणाइ उवणेइ ॥२१॥ एगम्मि य पत्थावे सिमेणब्भाहयस्स सूरिस्स । जायाए चित्तभायणवंछाए उचियसमयम्मि ।।२२।। तीए य तहच्चिय पूरियाए विम्हइयमाणसेो सूरी। भणइ कहं नायमिमं माणसियं मज्झ तए अजो! ॥२२ । ज उवणीयं अइदुल्लहंपि भाजं अकालपरिहीणं? । तीए भणियं णाणेण, केण, पडिवायरहिएण ।।२३।। धी धी मए अणज्जेण कहमिमो केवली महासत्तो। आसाइउत्ति सेोगं तो सूरी काउमारद्धो ॥२४॥ मा मुणिवर! सा सागं अमुणिज्जंतो केवलीवि जओ। पुवट्टिइं न भिदइ एवं तीए य पडिसिद्धो ।।२५।।
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