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________________ ।१९५॥ XXXXXXXXXXXXX मा योन्या निर्गच्छत्विति ॥२९॥ कुमरे पुंडरि भा इत्थिराग पइमरणणासपव्वजा । खुडग क्खण दिक्खा भंगे गम गीय चउबोही ॥१३०॥ X साकेयम्मि पुरवरे पुंडरिओ नाम भूवई तस्स । कंडरिओ लहुभाया जसभद्दा नाम से भजा ।।१।। अनमणहरंगी चंकमंति घरंगणे सा य । दिट्ठा पुंडरीएणं अज्झुववण्णेण अह तेण ॥२।। दुई विसञ्जिया लजिरीए तीए य सा पडिनिसिद्धा । अचंतं निब्बंघे य राइणो तीए पडिभणियं ।।३। किं न लहुभाइणो वि हु तं. लज्जसि जेण उल्लवसि | एवं । पच्छन्नो कंडरिओ तयण विणासाविओ रण्णा ॥४॥ अब्भत्थिया पुणोवि हु ताहे सा सोलखण्डण भएण । नियगाभरणाणि लहुं गहाय गेहाउ नीहरिया ॥५।। सत्थेण समं एगागिणी वि पडिवनजणगभावस्स । थेरव-18 णियनिस्साए नयरिं सावत्थिमणुपत्ता ।।६।। जियसेणसूरिसिस्सिणिकित्तिमयीमयहरीसमीवे य । वंदणवडियाए गया कहिओ सध्वो य वृत्तंतो ॥१॥ संबुद्धा पव्वइया विजंतोवि हु न साहिओ गब्भो। मयहरियाए, मज्झं मा | . पव्वज्ज न दाहित्ति ।।८। कालक्कमेण वुढेि गयम्मि गब्भम्मि मयहरीए। सा पुट्ठा एगंतम्मि कारणमवि तीए परि- कहियं ॥९॥ पच्छा पच्छन्नच्चिय ता धरिआ जा सुयं पसूया सा । सडकुलम्मि संवडिओ य सो जाव पव्वइओ ।।१०।। सूरिस्स समीवम्मि कयं च से नाम खुडुगकुमारो । सिक्खविओ य समग्गं जइजणजोग्गं समायारं ।।१।। अह जोव्वणमणुपत्तो संजममणुपालिउं अचायतो । पडिभग्गा जणि सो पुच्छइ उन्निक्खमणहेउं ॥१२॥ पडिसिद्धी जणणीए बहुप्पयारेहि तहवि नो ठाइ । पच्छा तीए भणिओ पुत्तय ! मज्झोवरोहेण ॥१३॥ पडिपालसु बारसवच्छ ॥१९५'।
SR No.600268
Book TitleUpdeshpad Mahagranth Satik Part 01
Original Sutra AuthorJinendrasuri
Author
PublisherHarshpushpamrut Jain Granthmala
Publication Year1989
Total Pages438
LanguageSanskrit
ClassificationManuscript
File Size8 MB
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