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शपदे
अथ० ०कलप० कर्मत्रि०
श्रादे- उत्तारेइ तओ भणिओ णेण जह सञ्चसंधो सि । पुत्त ! तओ तेणं अजसभीरुणा कहवि पडिवन्ना ॥७५।। दाऊण
ओसहाइं नीरोगसरीरगा कया लेण। निसुयं रन्ना पंडियसिरोमणी कप्पगो एत्थ ॥७६।। सद्दाविय तो भणिओ रन्ना, जह रचितगो होहि । तं कप्पय असरिससेमुहीइ उवहसियगुरुबुद्धी ।।७७।। तह सव्वं चिय रज्जं तुज्झ वसे जेण भद्द !
मम्हाणं । गासच्छायणमेत्तं मोत्तुं नहु कज मन्त्रेण ॥७८॥ कह किविसमेयमहं पडिवज्जेज्जा भणेइ सो ताहे। एसो न निर।।१४८।। वराहो चितेइ निवा वसे होही ।।७९।। भणिओ रन्ना साहीइ तीइ जो धोयगो परिव्वसइ । किं कप्पगवत्थाइं तं धोवसि
अहव अन्नोत्ति ? ॥८०॥ अहमेव तेण भणिए एत्ताहे जइ समप्पई वत्थे । ता सव्वहावि मा देज एवमेसा पडिनिसिद्धो ॥८१।। अह इंदमहे पत्ते भजाए कप्पगो इमं भणिओ । मम पिययम ! वत्थाई चंगाइं तुमं रयावेह ।।८२।। अइसंतुट्रमणो सो निच्छइ ता जा पुणो पुणो भणइ । नीयाणि ताणि रयमस्स मंदिरे ताणि वत्थाणि ॥८३।। सो भणइ अहं
मोल्लं विणावि रंगेमि ते इमाणि त्ति । सो मग्गिओ छणदिणे अजंहिजो समप्पेमि ।।८४॥ इयभणिरो सो कालं गमेइ Xजा बीयमागणं वरिसं । एवं तइयंपि तओ गाढं सो मग्गिउं लग्गा ॥८५।। तहवि न अप्पेइ जया ताहे सो रोसरत्तस
व्वंगा। तं भणइ तुज्झ रुहिरेण जइ न रंगेमि वत्थाई ।।८।। तो जलियभीमजाउलम्मि पविसामि निच्छयं जलणे तो पत्तो नियगेहे गहिया असिपुत्तगा निसिया ।।८७।। रयगगिहम्मि अइगओ ताहे रयगेण भारिया भणिया आणेहि | देहि वत्थाणि जावे सा तंतहा कुणइ ।।८८।। कप्पेण तस्स उदरं फालित्ता ताहि रुहिररत्ताणि । विहियाणि तस्स भजाइ कप्पगो भणिउमाढत्तो।।८९।। किं एस निरवराहा हओ तए जेण वारिओ रन्ना । तेणेसा चिरकालो जाओ वत्थाणमप्पिणणे ॥९०॥ *
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