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________________ श्रीजैन कथासंग्रहः ।श्री अथ सुसढचरित्रम् । ॥३५॥ मो! भो!जह मह धूआ एसा नामेण सुजसिरी॥४३॥ सोहं सुजसिवो जेण, विक्किया विप्पमंदिरे एसा। अहह! 38 अभग्गेण मए, परिणीआ विहिवसेण तओ॥४४॥ता भो मह वयणमिणं, सुणंतु लोगा य लोगपाला य। को अन्नो पाविट्ठो, मज्झ सयासा उभुवणे वि॥४५॥ लोअट्ठिइ जेण इमा, कनाए जाइ सीलकुलमाई। सुणिउं ते वीवाहिति, जे उ इह उत्तमा पुरिसा ॥ ४६ ॥ अन्नह जणणी भइणी, धूआ माईहिं सद्धिमवि हुजा । संजोगो विहिवसओ, विसयपसत्ताण इत्थ भवे ॥ ४७ ॥ अहह ! मए पावेणं, एवं अविभाविउं इमं पावं । काउं कह पक्खित्तो, अप्पा दुहदारुणे नरए॥४८॥ता भो अइदारुणपाव-पंकमयलियतणुस्स मह नत्थि। मुत्तुं जलंतजलणं, अन्नं नहु किं पि पच्छित्तं ॥४९॥ इय भणिऊणं बाहिं, कठेहिं कारिउं महंतचिअं। आरूढो सो पुरजण-पुरओ 'अप्पं खुनिंदंतो॥५०॥ अह महुघयमाईहिं, पक्खित्तेहिं पि सो न जा जलइ। तो लोएणं भणिअं, गोअम! सो एरिसं वयणं॥५१॥ हा पाव दुह निक्किट्ठ-धिट्ट समसत्तुमित्तभावेवि। न दहइ दहणो देहं, महंतपावोदया तुज्झ॥५२॥ इय घिद्धीकाररवेणं, निहणिउं सो पणइणीसहिओ। निद्धाडिओ अताहे, ता तेणं जणसमूहेणं ॥५३॥ भयवं! कह सो अग्गी, नहु जलिओ तो जिणो भणइ चियगा। भवियव्वयाइ, रइआ अग्गिअडझेहिं कठेहिं॥५४॥ अह दटुं सो मुणिवर-संघाडयमन्नगाममज्झाओ। गहिअन्नपाणनिजंत-मेसि पिढेि समणुलग्गो ॥५५॥ तो उजाणे पत्तो, पिच्छइ सुरअसुरनमियपयपउमं । जगदानंदणनाम, सूरि चउनाणसंजुत्तं ॥५६॥ तं ॥३५॥
SR No.600265
Book TitleJain Katha Sangraha Part 04
Original Sutra AuthorKalyanbodhivijay
Author
PublisherJinshasan Aradhana Trust
Publication Year1998
Total Pages272
LanguageSanskrit
ClassificationManuscript
File Size16 MB
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