________________
48488* अष्टमांग-अंतगड दशांग सूत्र 484881..
wwwmarwinnamommarimmammmmmanand
महीवार वदति निम्गछिहि माणं तव सरीरयरस वावात भविस्सइ, तुमेणं इहंचेवर समणं भगवं महावीरं वदाहि ॥ २६ ॥ तएणं से सुंदसणे से?अम्मपियरे एवं वयासी-किणं अहं अम्मयातो समणं भगवं महावीर इहमागया, तंइह संपत्तं, इहसमोसळू इहगतेचेव वंदिसमि,तंगच्छामिणं अहं अम्मयाओ तुब्भहि अब्भणु णायसमाणे. समणं भगवं महावीरं वंदामी ॥ २७ ॥ तएणं तं सुदसणंसदि अम्मापियरी जाव नो संचएति बहुइं आघवणहिय जाव परूवणहिप, ततो तेही एवं व्यासी-अहासुहं .
॥ २८ ॥ ततणं से सुदंसणे अम्मापियरेहिं अब्भणुणाए समाण व्हाए सुद्धपावसाइ. माली यावत् घात करता विचरता है, हे पुत्र! तूं जो श्रमण भगवंत महावीर स्वामी को वंदना करने जावे गातो तुझे अर्जन माली से शरीर को बाधा होगा इसलिये तू यहाँ रहा हुवा श्रमण भगवंत को वंदना नमस्कार करो ॥ २६ ॥ तब सुदर्शन शेठ मातापिता से यों कहने लगा-किस प्रकार मैं अहो मातापिता ! श्री महावीर स्वामी यहां आये, यहां पाप्त हुवे यहां समोसरे, यहां रह, उनको यहां घर में रहा वंदना करूं? इसलिये अहो मातापिताओं! जो तुमारी आज्ञा हो तो मैं श्रमण भगवंत श्री महावीर स्वामी का पंदन जानूंगा॥२७॥ तब सुदर्शन शेठको उनके मातापिता बहुत प्रकारसे अग्रहकर प्ररूपनाकर, रोकने समर्य न हुवे तब वे इसप्रकार बोले-तेरेको सुखहो सो करो॥२८॥तब वह सुदर्शन मातापिताकी आज्ञाप्राप्तझेते, स्नानकिया,
48 पष्टम-वर्गका तृतीय अध्यायन *
अर्थ
*
For Personal & Private Use Only
Jain Education International
www.iainelibrary.org