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________________ १ अनुवादक-बालब्रह्मचारी मुनि श्री अमोलक ऋषिजी सण संठाण मोठयादोवितस्स बसणा, जमल कोठिया संठाण सठिया दोबीतस्सउरु, अजणगुटुं व तस्स जाणति, कुडिल लकुडिलाई विगय बीभत्थ दंसणाई जंघाओ, करकडिओ लोमेहिं उवचियातो,अहिरी संठाण संठिया दोवीतस्सपाया,अहिरीलोढ संठाण संठित्ताओ प.देसु अंगुलिओ, सिप्पियुड संठण संठिया सेणक्खा, लडहमडह जाणूए विगय भाग भुग्गय भमहे,अवदालित वदणविरे,निल्लालियग्गजीहे,सरडकय मालियाए, उंदुरमालापरिणड सुकचिंधे, उलकय कण्णपुरे, सप्पकयविगच्छे, अफोडते अभिधाम्य के भरे हुवे दो कोठे जैसी दोनों जंघा थी, अर्जुन वृक्षकी गांठ के जैसे दोनों जानू-घुटने थे, मंघापर बांके कुटिल भयंकर दर्शनवाली कठिन रोमावाली थी, अधर सिला समान पगथलीयों थी, अहिरन के लोहे (बचे) के संस्थान पांचकी अंमुलीयों थी, सीपके एर संस्थान व स्थिल पदांगुलीके नख थे. दोनों नानू . कते हुवे भयंकर लालगलित बांका मुख के बाहिर जान निकाला हुवा था, सरदा का-कांकीडे माला मस्तकमें पहने हुवे, ऊंदर के भूषन गलेमें बंधे हुर, नवलके आभरण कानों में पहने हुबे, सर्पका उत्तरासन कियाहुवा, या हाररूप पाने हुवे. इस प्रकार रूावनाकर आकाश को फेोहे ऐसे अटहास्य करता करस्फोट ता-वालीयों पीटता. मेघज्यों गर्जनाहगावहत प्रकार के पांचों वर्णक रोमकर उपचित-पुष्ट बना, ऐपाए • प्रकाशक राजाबहादुर लाला मुखदेवसहायजी ज्वालाप्रसादजी . ETOT Jain Education International For Personal & Private Use Only www.jainelibrary.org
SR No.600255
Book TitleAgam 07 Ang 07 Upasak Dshang Sutra Sthanakvasi
Original Sutra AuthorN/A
AuthorAmolakrushi Maharaj
PublisherRaja Bahaddurlal Sukhdevsahayji Jwalaprasadji Johari
Publication Year
Total Pages170
LanguageSanskrit
ClassificationManuscript & agam_upasakdasha
File Size18 MB
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