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अर्थ
सप्तमांग-उपशाक दशा मूत्र
तंजहा-सचित्ताहारे, सचित्त पडिबडाहारे, अपोलित्तोसहिभक्रवणया, दुप्पउलित्तो सहिभक्खणया, तुच्छोसहि भणया ॥ मम्मओणं समणोनासएणं पण्णरस्स कम्मा दाणाति जाणियवाति नसमारियव्वाति तंजहा-इंगालकम्मे, वणकम्मे साडीकम्म,
भाडीकम्मे, फोडीकम्मे; दंतवणिजे, रसबणिज्जे, केसवणिजे, विस्वणिज, लक्खीणजे करे, ४ दुपक्य-पककर विगडगइ-सडगइ वस्तु कामाहारकरे, ५ तुच्छ-असार खाना थोडा डालना बहुत ऐसी वस्तु का आहार करे । और कर्म-व्यापर मे पन्नरे प्रकार के कर्म आने के कारन रूप व्यापर जानना. परंतु आदरना नहीं उनके नाम-१ अग्निकर्म-अनि प्रयोगकर व्यापार कर-लोहकार सुवर्णकार कुंभ कारादिका या कोयले बेंचनेका व्यापारकरेअनकी-वन कटाकर-काष्टपत्र फुल फलादिका व्यापरकरे, ३ साडी कर्म गाडा गाडी आदि वाहन का व्यापर करे, ४ भाडी कर्भ-गाडी वेल अश्चादि पासुओं को भाडे देने का व्यापर
करे, ५ फोडी कर्म-खदान खोदाने का, दालादि दलाने का पिलाने का, धातुओं के आगरों का व्यापर * करे, ६ दंत-वणिज्य दान्तो का दरों का नवका चमड़े का व्यापरकरे, ७ रस वणिज्य-घत तेल दूग्ध
दही गुडसकर प्रमुख परवाही वस्तुका व्यापर को,८ विष वाणिज्य-अफीम वच्छनागादि जहरी वस्तु काया व शस्त्र का व्यापर करे, ९ केस वणिज्य-चमरी गायके वालों ( चमरों) का तथा मनुष्य पशु को बेचने का व्यापरकरे, १० लक्ख वणिज्य-लाख, चपडी, धावडी, गुली, हरताल, मणसिल, वगैर का व्यापरकरे, ११
46 आणंद श्रावक का प्रथम अध्ययन +
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