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________________ + सप्तमांग-उपशाक दशा सच रजातिकम्मे, कडतल्लकडमाणे, तप्पडिरूवगवहारे ॥४७॥ तदाणं तरंच सदार संतोसीए पंचअइयारा जाणियवा नसमायरियव्वा तंजहा-इत्तिरिय परिग्गहीयागभणे, अपरिगहियागमणे, अनंगकीडाकरणे, परविवाहकरणे, कानभोगानिबामिल से ॥ ४८ ॥ तयाणं तरचणं इच्छापरिमाणस्स समाचासएणं पंचअइयारा जाणियव्वा नसमारियव्वा तंजाह-खिन्नवत्थु प्यमणातिक्कम्मे,हिरण्णसुवा प्परगाणातिकमे, धणधन्न च्यापार करना॥४७॥ तदनन्तर चौथा स्वदारा (स्वखी) सन्तापित व्रत के पांच अनिवार जाने परंतु पादरे नहीं, उन के नाम- इतर छोटी उमर की स्वस्त्रीस गमन करे अपरणित सगाइ दुइ स्वस्त्री से गमन करे .. पर स्त्री से-या प्रत्याख्यान के दिन ससस्त्री से योनि छोड कुचादि अनङ्ग के साथ क्रीडा करे, ४ अन्य के विवाह करावे, तथा अन्य की मांग से आप विवहा कर और ५ काम भोग की तिम्र अभिलाषा करे भोग में आशक्त बने अनियमित भोग भोगवे.॥४८॥ तदनन्तर पांचवा इच्छा परिमाण व्रत के पांच अतिचार जाने परंतु यादरे नहीं उनके नाम--१ खेत्र-खली भूमि वत्थुढकी भमिका जो प्रमाण किया हो उसे उल्लंघ,२हिरण्य-चादी, सुवर्ण-मोने का परिमाण उलंघ, द्विीपद मनुष्य पक्षी, चतुष्पद-पशु का __* इन दोनों आतिचार का कितनेक ऐसा अर्थ करते है बेश्याआदि को कुछ स्वल्प काल का लिये द्रव्य दे कर है अपनी स्त्री बनाये, २ कुमारिका विधवा से गमन करे, परन्तु यह तो अनाचार होते हैं. इस लिये यह स्वस्त्री ही जानना > आणंद श्रावक का प्रथम अध्ययन 498+ 8 Jain Education International For Personal & Private Use Only www.jainelibrary.org
SR No.600255
Book TitleAgam 07 Ang 07 Upasak Dshang Sutra Sthanakvasi
Original Sutra AuthorN/A
AuthorAmolakrushi Maharaj
PublisherRaja Bahaddurlal Sukhdevsahayji Jwalaprasadji Johari
Publication Year
Total Pages170
LanguageSanskrit
ClassificationManuscript & agam_upasakdasha
File Size18 MB
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