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________________ य, तत्थ णं जे से मायिमिच्छादिट्ठियवन्नए नेरइए से णं महाकम्मतराए चेव जाव महावेयणतराए चेव, तस्थ णं जे से अमाथिसम्मदिट्टिउवयन्नए नेरइए से णं अप्पकम्मतराए चेव जाव अप्पवेयणतराए चेव, दो भंते 1 असुरकुमारा एवं मेष एवं एमिंदिकम्यिलिंदियां जाव वेमानिया ॥ ( सूत्रं ३२७ ) । 'दो भंते । नेरइए' त्यादि, 'महाकम्मतराए चेव' त्ति इह यावत्करणात् 'महाकिरियतराए के महासवतराए चेव' ति दृश्यं, व्याख्या भास्य प्राग्वत् । 'रुगिदियविगलिंदिययजं ति इहैकेन्द्रियादिवर्जनमेतेषां मायिमिथ्यादृष्टित्वेनामायिसम्यग्दृष्टिविशेषणस्यायुज्यमानत्वादिति ॥ प्रागू नारकादिवक्तव्य तोक्ता ते चायुष्कप्रतिसंवेदनावन्त इति तेषां तां निरूपयन्नाह— नेरइए णं भंते ! अनंतरं उघट्टित्ता जे भविए पंचिंदियतिरिक्खजोणिएस उववज्जित्तए से णं भंते ! कयरं आउयं परिसंवेदेति ?, गोयमा ! नेरइयाउयं पडिसंवेदेति पंचिंदियतिरिक्खजोणियाउए से पुरओ कडे चिट्ठति, एवं मणुस्सेसुवि, नवरं मणुस्साए से पुरओ कडे चिट्ठइ । असुरकुमारा णं भंते ! अनंतरं उघट्टित्ता जे भविए पुढविकाइएस उववज्जिन्तए पुच्छा, गो० ! असुरकुमाराज्यं पडिसंवेदेति पुढविकाइयाउए से पुरओ कडे चिट्ठइ, एवं जो जहिं भविओ उवकज्जितए तस्स तं पुरओ कडं चिट्ठति, जत्थ ठिओ तं पडिसंवेदेति जाव वैमाणिए, नवरं पुढचिकाइए पुढविकाइएस उववज्जति पुढविकाइयाउयं पडिसंबेएति अन्ने य से पुढविक्काइयाउ‍ | पुरओ कडे चिट्ठति एवं जाब मस्सो सद्वाणे उबवाएको परद्वाणे तहेब || (सूत्रं ६२८) दो भंते ! असुरकुमारा Jain Education International For Personal & Private Use Only www.jainelibrary.org
SR No.600226
Book TitleBhagwati sutram Part 03
Original Sutra AuthorAbhaydevsuri
Author
PublisherAgamoday Samiti
Publication Year1921
Total Pages654
LanguageSanskrit
ClassificationManuscript & agam_bhagwati
File Size13 MB
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