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________________ MARRERA व्याख्यावया भणिया सा चेव एगिदियाणं इह भाणियवा जाव समाउया समोववन्नगा । एगिदिया णं भंते ! कति &|१७ शतके प्रज्ञप्तिः | लेस्साओ प०१, गोयमा! चत्तारि लेस्साओ पं०, तं-कण्हलेस्सा जाव तेउलेस्सा । एएसि णं भंते ! एगिदि- मा उद्देशः ५ अभयदेवी-याणं कण्हलेस्साणं जाव विसेसाहिया वा ?, गोयमा ! सवत्थोवा एगिदियाणं तेउलेस्सा काउलेस्सा अणंत-ईशानसुध. या वृत्तिः२ गुणा णीललेस्सा विसेसाहिया कण्हलेसा विसेसाहिया। एएसि णं भंते ! एगिदिया णं कण्हलेस्सा इड्डी जहेव मसभा सू दीवकुमाराणं, सेवं भंते ! २॥ (सूत्रं ६१०)॥१७-१२॥ नागकुमारा णं भंते ! सवे समाहारा जहा सोल- ६०३ उ.६. ॥७३०॥ समसए दीवकुमारुद्देसे तहेव निरवसेसं भाणियवं जाव इड्डीति, सेवं भंते ! सेवं भंते ! जाव विहरति ॥ | १७ पृथ्वा(सूत्रं ६११)॥१७-१३ ॥ सुवन्नकुमारा णं भंते ! सवे समाहारा एवं चेव सेवं भंते !२॥ (सूत्र ६१२)॥ दीनां संप्रा त्युत्पादौ ॥ १७-१४ ॥ विजुकुमारा णं भंते ! सवे समाहारा एवं चेव, सेवं भंते!२॥ (सूत्र ६१३)॥१७-१५॥ वायुकुमारा णं भंते ! सो समाहारा एवं चेव, सेवं भंते !२॥ (सूत्रं ६१४)॥१७-१६ ॥ अग्गिकुमाराणं भंते ! सवे समाहारा एवं चेव, सेवं भंते ! २॥ (सूत्रं ६१५)॥१७-१७॥ सत्तरसमं सयं समत्तं ॥१७॥ ___ 'पुढविकाइए ण'मित्यादि, 'समोहए'ति समवहतः-कृतमारणान्तिकसमुद्घातः 'उववजित्त'त्ति उत्पादक्षेत्रं गत्वा 'संपाउणेज'त्ति पुद्गलग्रहणं कुर्यात् उत व्यत्ययः इति प्रश्नः, 'गोयमा ! पुर्वि वा उववजित्ता पच्छा संपाउणेजति ॥७३॥ मारणान्तिकसमुद्घातान्निवृत्य यदा प्राक्तनशरीरस्य सर्वथात्यागाद् गेन्दुकगत्योत्पत्तिदेशं गच्छति तदोच्यते पूर्वमुत्पद्य पश्चात्संप्राप्नुयात्-पुद्गलान् गृहीयात् आहारयेदित्यर्थः, 'पुर्वि वा संपाउणित्ता पच्छा उववजेज'त्ति यदा मारणान्तिकसमु R Jain Education International For Personal & Private Use Only www.jainelibrary.org
SR No.600226
Book TitleBhagwati sutram Part 03
Original Sutra AuthorAbhaydevsuri
Author
PublisherAgamoday Samiti
Publication Year1921
Total Pages654
LanguageSanskrit
ClassificationManuscript & agam_bhagwati
File Size13 MB
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