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व्याख्या
प्रज्ञप्तिः अभयदेवीया वृत्तिः १
॥२८७॥
तदसम्भवादिति 'त' मित्यादि, 'तत्' ऐर्यापथिकं कर्म 'देसेणं देतं'ति 'देशेन' जीवदेशेन 'देश' कर्म्मदेशं बनाती त्यादि चतुर्भङ्गी, तत्र च देशेन कर्म्मणो देशः सर्वे वा कर्म्म सर्वात्मना वा कर्म्मणो देशो न बध्यते, किं तर्हि ?, सर्वात्मना सर्वमेव बध्यते, तथास्वभावत्वाज्जीवस्येति ॥ अथ साम्परायिकबन्धनिरूपणायाह
संपरायणं भंते! कम्मं किं नेरइयो बंधइ तिरिक्खजोणीओ बंधह जाव देवी बंधइ ?, गोयमा ! नेरहओवि बंधइ तिरिक्खजोणीओवि बंधइ तिरिक्खजोणिणीवि बंधह मणुस्सोवि बंधह मणुस्सीवि बंधह देवोवि बंधइ देवीवि बंधइ ॥ तं भंते ! किं इत्थी बंधइ पुरिसो बं० तहेव जाव नोहत्थीनोपुरिसोनोनपुंसओ बंधइ ?, गोयमा ! इत्थीवि बं० पुरिसोवि बंधइ जाव नपुंसगोवि बंधइ अहवेए य अवगयवेदो य बंधइ अहवेए य | अवगयवेया य बंधइ । जह भंते! अवगयवदो य बंधइ अवगयवेदा य बंधन्ति तं भंते । किं इत्थीपच्छाकडो | बंधइ पुरिसपच्छाकडो बंधइ ? एवं जहेव ईरियावहियाबंधगस्स तहेव निरवसेसं जाव अहवा इत्थीपच्छाकडा य पुरिसपच्छाकडा य [ बंधइ ] नपुंसगपच्छाकडा य बंधंति ॥ तं भंते ! किं बंधी बंधइ बंधिस्सह १ बंधी बंधइ न बंधिस्सइ २ बंधी न बंधइ बंधिस्सइ ३ बंधी न बंधइ न बंधिस्सइ ४१, गोयमा ! अस्थेगतिए बंधी बंधड़ बंधिस्सइ १ अत्थेगतिए बंधी बंधइ न बंधिस्सइ २ अत्थेगतिए बंधी न बंधइ बंधिस्सर ३ अत्थेगतिए बंधी न बंधइ न बंधिस्सइ ॥ तं भंते ! किं साइयं सपज्जवसियं बंधइ ? पुच्छा तहेव, गोयमा ! साइयं वा सपज्जवसियं बंधइ अणाइयं वा सपज्जवसियं बंधइ अणाइयं वा अपज्जवसियं बंधइ णो चेव णं साइयं अप
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८ शतके उद्देशः ८ सांप राय
क बन्धः सू ३४३
॥३८७॥
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