SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 41
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ विद्यारत्नमहानिधी चतुर्थोऽ धिकारः४ इति दशपूर्वधराचार्य श्रीभद्रगुप्तविरचितायां श्रीविद्यारत्नमहानिधौ अनुभवसिद्धमंत्र द्वात्रिंशिकायां शुभाशुभादिमंत्राष्टक वर्णनोनाम चतुर्थोधिकारः अथातः संप्रवक्ष्यामि, गुरुशिष्य शुभाशुभम् । येनविज्ञान मात्रेण, कल्याणं जायते द्वयोः ॥ १॥ भाषा-अबमैं गुरुशिष्यका शुभाशुभ वर्णन करुंगा जिसके जाननेसे दोनोका कल्याण होता है. गुरुनाज्ञात तत्वेन, सकलागमवेदिना । शंशांकशान्तचित्तेन, क्षमागुणविराजिना ॥२॥ भाषा-सकलागमका जानकार तत्वज्ञानी चन्द्रके समान शान्त, चित्तवाले तथा क्षमा गुण विराजित गुरु होते है. पूर्वमात्महितं ज्ञात्वा, सूरिणा गुणभूरिणा । शिष्यस्यापि हितं चिन्त्यं, दातुकामेन किञ्चन ॥३॥ भाषा-बहत गणवाले आचार्योने पहले आत्महित जानके शिष्यको मंत्र देनेकी इच्छासे उसकाभी हित विचारना. सिद्धं साध्यंचविज्ञेयं, सुशुद्धं शत्रुरूपिणं । मृत्युदं चैवनिःशेषं, मंत्रमंत्रविदो विदुः ॥४॥ भाषा-सिद्धं साध्यं सुशुद्धं शत्रुरुपिणं मृत्युदं ऐसे पांच हिस्सोमें सब मंत्रको विभक्त करना ऐसा मंत्रवादि कहते है. सिद्धं सारफलंज्ञेयं, दातव्यं भक्तिशालिने । साध्यं साध्यफलं चापि, देयं तदपि सूरिणा ॥ ५॥ स्वल्पं फलं सुसिद्धंच, मंत्रो यच्छति देहिनाम् । सोपिकस्यापिदातव्य-स्तद्धितस्य शरीरिणः ॥ ६ ॥ Jain Educa For Personal Private Use Only + ininelibrary.org
SR No.600214
Book TitleVidyaratna Mahanidhi
Original Sutra AuthorBhadraguptasuri
Author
PublisherMahavir Granthmala
Publication Year1936
Total Pages50
LanguageSanskrit
ClassificationManuscript
File Size5 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy