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पर्वतोंमे, अतिउत्तम (मेरु) से, अधिक, दृढतावाले |१२| कुसुमलता छंद । सत्व में, फेर, सदा, अजितः । शरीरसंबंधी, और, बलमें, अजित । धरणिधर, पवरा, इरेअ, सारं ॥ १५॥ कुसुमलया। सत्ते, अ, सया, अजिअं । सारीरे, अ, 'बले, अजिअं ॥ तप, संयममें, और, अजित (ऐसे)। यह ( मैं ), स्तत्रताहूं, जिनकुं, अजितनाथ | १६ | भुजगपरिरिंगित छंद । सौम्य के गुणोंसे, पाता है, 'तव, संजमे, अ, अजिअं । "एस, थुणामि, "जिणं, "अजिअं ॥१६॥ भुअगपरिरिंगिअं । सोम,गुणेहिं, पावई, नहीं,उनकुंड,नवीन,शरदऋतुका, चंद्रमा । तेजके, गुणोंसे, पाता है, नहीं, उनकुं, नवीन, शरदऋतुका, सूर्य । रूपके, गुणोंसे, पाताहै, नहीं, न, तं, 'नव, सरय, ससी । तेअ, गुणेहिं, "पावइ, न, 'तं, नव, सरय, रवी ॥ रुव, गुणेहिं, "पावइ, न, उनकुं, त्रिदश (देव) गणका पति ( इंद्र ) । दृढताके, गुणोंसे, पाताहै, नहीं, उनकुं, पर्वतोंका, पति (मुमेरु) | १७| खिद्यतक छंद । धर्मतीर्थ, तं, "तिअस गण, वई । "सार, गुणेहिं, पावइ, "न, "तं, धरणिधर, वई ॥ १७॥ खिज्जिअयं । तित्थ,
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उत्तम, प्रवर्त्तानेवाले, अज्ञान, रजसे, रहित । पंडितजनोंसे, स्तुत५, पूजित, नष्टहुए है, कलह, मैलजिन्होंके। शांति, सुखको, प्रवर्तानेवाले, तीनकरण से, 'वर, पवत्तयं, तम, रय, रहियं । धीरजण, थुअ, ऽच्चिअं, चुअ, कलि, कलु ॥ संति, सुह, पवत्तयं, तिगरण, सावधानहोकर, शांतिनाथके, मैं, महामुनि (ऐसे), शरणकुं, प्राप्तकरता हूं १८ ललितक छंद । विनयसे, नमेहुए, शिरपर, रचीहुइ, अंजलिवाले, ॥१०८॥ सिर, रइअंजलि, पयओ, "संति, 'मऽहं महामुणिं, सरण, मुवणमे ॥ १८ ॥ ललिअयं । 'विणओ, णय,
१ आत्मबल | २ अन्यदेवादिकोंसे नहीं जीतानेवाले । ३ शीतलता । ४ अजित जिनकुं । ५ स्तुति कियेहुए ।
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