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प्रशमरति प्रकरणम्
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२॥
भावार्थ:-उपर कहेला सम्यग्दर्शन ( तत्वश्रद्धान )थी विपरीतपणु, गुरुउपदेशनो अनादर अने संशय ते मिथ्यात्व छे. प्रत्यक्ष अने परोक्ष एवं ज्ञान पांच प्रकारनुं छे. तेमा श्रुतज्ञान अने मतिज्ञान एम बे प्रकारचें ज्ञान परोक्ष जाणवुः अने अवधि, मनःपर्याय तथा केवल ए त्रण प्रकारे प्रत्यक्ष (ज्ञान) जाणवू. उत्तरभेद विषयादिवडे थाय छे, तेथी आ ज्ञाननो विशेष बोध थइ शके छे. एक आत्माने विषे एकथी मांडीने चार ज्ञान पर्यंत होवा घटे छे. सम्यग्दृष्टि जीवनुं ज्ञान निश्चे करीने सम्यगज्ञान कहेवाय छे, तेमज मिथ्यात्वसंयुक्त एवां आदिनां त्रण (ज्ञान ) अज्ञान कहेवाय छे.
विवेचन-आ चार श्लोक पैकी प्रथमना अर्धा श्लोकमां ज मिथ्यात्वनुं स्वरूप कहेलुं छे. तत्वार्थनी यथार्थ श्रद्धा न होवी ते मिथ्यात्व छे. ज्यांसुधी प्राणीने कर्मस्थिति विशेष होय छे त्यांसुधी तेने तत्त्वार्थनी श्रद्धा थती ज नथी. आ | संसारमा अनादि काळथी अनंत पुद्गल परावर्तन करतां ज्यारे प्राणीने छेनुं पुद्गल परावर्तन प्राप्त थाय छे अर्थात् भावी संसार मात्र एटलो ज रहे थे त्यारे तेनामां मार्गानुसारीपणुं आवे छे अने ते करतां पण ज्यारे संसारस्थिति घटेअर्ध पुद्गल परावर्तन जेटली वधारेमा वधारे रहे त्यारे जीव समकित पामे छे. ज्यांसुधी जीव समकित पामतो नथी त्यांसुधी तेनामां विपर्ययभाव रहे छे. जड चेतननुं वास्तविक स्वरूप तेने समजातुं नथी-तेना पर यथार्थ श्रद्धा आवती ज नथी. तेवा भावने शास्त्रकारे मिथ्यात्व कहेल छे. तेना अभिग्रहिक, अनभिग्रहिक, अभिनिवेशिक, अनाभोगिक अने सांश- | यिक एवा पांच प्रकार छे. तेमज बीजा पण तेना घणा मेदो शास्त्रमा बतावेला छे. ते भेदोने बराबर समजीने जेटलो प्रयास थइ शके तेटलो करी मा महान् दोषने टाळवानी जरूर छे. प्राणीनो परम शत्रु मिथ्यात्व छे. तेनावडे ज प्राणी
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